Thursday, July 9, 2020

श्री खाटूश्याम मंदिर का महत्त्व, पौराणिक कहानी और अन्य जानकारी

श्री खाटूश्याम जी मंदिर  Khatushyam ji Mandir in Hindi

खाटूश्याम जी मंदिर

श्री खाटूश्याम जी का मंदिर भारत का एक बहुत ही प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है, यह मंदिर राजस्थान के सीकर जिले के खाटू नामक गांव में स्थित है, रींगस रेलवे स्टेशन खाटू से सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन है, रींगस से खाटू की दुरी लगभग 17 किलोमीटर है, जयपुर एयरपोर्ट खाटू से सबसे निकटतम एयरपोर्ट है, जयपुर से खाटू की दुरी लगभग 80 किलोमीटर है तथा भारत की राजधानी दिल्ली से इस मंदिर की दुरी लगभग 266 किलोमीटर है। 
 

महत्त्व 

भारत में बहुत से प्रसिद्ध चमत्कारिक मंदिर है इनमे से खाटूश्याम जी मंदिर भी एक है, इस मंदिर में पाण्डु पुत्र महाबली भीम के पोते तथा घटोत्घच और मोरवी के पुत्र बर्बरीक की पूजा की जाती है, बर्बरीक ने भगवान् श्री कृष्ण को अपने शीश का दान किया था, इससे प्रसन्न होकर भगवान् श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को कलयुग में अपने नाम श्री श्याम नाम से पूजे जाने का आशीर्वाद दिया था। 

खाटूश्याम जी की संक्षिप्त कहानी 

महाबली भीम और हिडम्बा के पुत्र वीर घटोत्घच का विवाह राजा मूर की पुत्री कामकंटका से हुआ था, माता कामकंटका को मोरवी के नाम से भी जाना जाता था, वीर घटोत्घच और माता मोरवी को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिनका नाम उन्होंने बर्बरीक रखा।

बर्बरीक ने भगवान् श्रीकृष्ण के कहने पर दुर्गा देवी की कठोर साधना की, बर्बरीक की कठोर साधना से प्रस्सन होकर दुर्गा देवी ने बर्बरीक को कई शक्तियाँ और तीन दिव्य बाण प्रदान किये, ये ऐसे बाण थे जिनका सामना किसी भी शास्त्र के द्वारा नहीं किया जा सकता था तथा ये बाण एक ही बार प्रयोग करने पर सम्पूर्ण सेना का विनाश करके वापस लौट आते थे। ऐसे दिव्य और शक्तिशाली बाण प्राप्त करके बर्बरीक महाभारत के सबसे शक्तिशाली और अजेय योद्धा बन चुके थे जो केवल अपने एक ही बाण से सभी योद्धाओ का अंत कर सकते थे।

महाभारत का युद्ध शुरू होने पर वीर बर्बरीक ने अपनी माता मोरवी से इस युद्ध में पांडवों की ओर से युद्ध करने  की आज्ञा मांगी। माता मोरवी ने बर्बरीक से कहा की तुम इस युद्ध में हारने वाले पक्ष की तरफ से युद्ध करोगे, बर्बरीक से ऐसा वचन लेकर माता मोरवी ने बर्बरीक को युद्ध में भाग लेने की अनुमति दी।


भगवान् श्री कृष्ण को महाभारत के युद्ध के विषय में पहले से ज्ञात था की इस युद्ध में पांडवों की विजय होने वाली है, इसलिए जब उन्हें इस बात का पता चला की बर्बरीक इस युद्ध में हरने वाले पक्ष की ओर से युद्ध करने वाले है, तो श्री कृष्ण पांडवों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गए और उन्होंने बर्बरीक से उनका शीश दान में मांग लिया।

वीर बर्बरीक ने सहर्ष अपना शीश भगवान् श्री कृष्ण को दान में देना स्वीकार कर लिया और साथ ही उन्होंने भगवान् श्री कृष्ण से महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा भी प्रकट की। भगवान् श्री कृष्ण ने प्रस्सन होकर बर्बरीक को आशीर्वाद दिया की शीश का दान देने के बाद भी उनका शीश जीवित रहेगा और महाभारत का युद्ध देख सकेगा। इसके अलावा भगवान् श्री कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया की कलयुग में बर्बरीक की श्री श्याम के नाम से पूजा की जाएगी और उनके दर्शन करने से भक्तो की सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।

फाल्गुन मेला 

हर साल फाल्गुन महीने में खाटूश्याम जी का मुख्य मेले का आयोजन किया जाता है, इस मेले को फाल्गुन मेला भी कहा जाता है, यह मेला 5 दिनों तक चलता है, जो की फाल्गुन शुक्ल अष्ठमी से फाल्गुन शुक्ल द्वादशी तिथि तक होता है, अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से यह समय फ़रवरी/मार्च महीने में होता है। वैसे तो पुरे साल भर खाटू में खाटूश्याम जी के दर्शन करने के लिए भक्त आते रहते है परन्तु फाल्गुन मेले के अवसर पर भक्तों की संख्या लाखों में पहुंच जाती है। 

इस मेले के दौरान पड़ने वाली फाल्गुन शुक्ल एकादशी खाटूश्याम जी की विशेष एकादशी मानी जाती है, इस दिन खाटूश्याम जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है, इस दिन मंदिर में सर्वाधिक श्रद्धालु खाटूश्याम जी के दर्शन करने आते है।

इस मेले में हर साल पचास लाख से अधिक श्रद्धालु खाटूश्याम जी का दर्शन करने आते है। इतनी बड़ी संख्या में भक्तो के आने पर उन्हें हर प्रकार की सुविधा प्रदान करने के लिए स्थानीय प्रशाशन और मंदिर प्रशाशन द्वारा विशेष इंतजाम किये जाते है, और ऐसा माना जाता है की इस मेले में खाटूश्याम जी स्वयं नीले घोड़े पर सवार होकर अदृश्य रूप में इस मेले की वयवस्था देखते है।

इस मेले में कई भक्तगण पदयात्रा करते हुए रस्ते में भजन कीर्तन करते हुए और नाचते गाते आते है, भक्तगण अपने साथ खाटूश्याम जी के झंडे भी लेकर आते है जिन्हें निशान कहा जाता है, ये झंडे मंदिर में चढ़ाये जाते है।  देश विदेश से आये हुए भक्तगण श्रद्धा भाव से खाटूश्याम जी के दर्शन करते है और दर्शन के बाद भजन और कीर्तन का आनंद लेते है, भजन संध्या में बहुत से गायक और कलाकार आते है जो रातभर भजन कीर्तन करते है। कुछ भक्तगण होली तक यहीं रुक जाते है और होली के दिन खाटूश्याम जी के साथ होली खेलने के बाद ही यहां से प्रस्थान करते है।


खाटूश्याम जी के मंदिर में फ़ाल्फ़ुन मेले के अलावा होली, बसंत पंचमी, कृष्ण जन्माष्टमी, झूल-झुलैया एकदशी आदि त्यौहार भी बहुत ही धूम धाम से मनाये जाते है।

आसपास के दर्शनीय स्थल 

श्री श्याम वाटिका 

खाटूश्याम जी के मंदिर के समीप ही श्री श्याम वाटिका स्थित है यहां के पुष्प श्री खाटूश्याम जी के श्रृंगार के लिए उपयोग किये जाते है। इस वाटिका में श्री खाटूश्याम जी के परम भक्त आलू सिंह जी की मूर्ति लगी हुई है जिनका दर्शन करने श्री खाटूश्याम के भक्त इस वाटिका में भी आते है। 

श्री श्याम कुंड 

खाटूश्याम जी के मंदिर के समीप ही श्री श्याम कुंड स्थित है, माना जाता है की यहीं से श्री श्याम के शीश का अवतरण हुआ था, इस कुंड में स्नान करने से भक्तो के सभी पाप नस्ट हो जाते है, यहां महिला और पुरुष भक्तो के लिए अलग अलग कुंड स्तिथ है। 

रहने खाने की वयवस्था 

खाटू नगरी में गेस्ट हाउस और सभी सुविधाओं से युक्त 3 स्टार तथा 4 स्टार होटल बड़ी संख्या में है, इनके अलावा यहां पर 300 से अधिक धर्मशालाएं भी है, जिसके कारण यहां पर किसी भी आय वर्ग के श्रद्धालुओं को ठहरने में कोई दिक्कत नहीं होती, परन्तु फाल्गुन मेले के दौरान होटल में पहले से बुकिंग करा लेना अच्छा होता है।

 इनके अलावा खाटू नगरी में भोजन करने के लिए ढाबा और रेस्टोरेंट की भी कोई कमी नहीं है।

मंदिर खुलने का समय 

सर्दी के मौसम में 

प्रातः काल 5.30 से दोपहर 1.00 तक

सायं काल 4.30 से रात्री 9.30 तक    

गर्मी के मौसम में / In Summer

प्रातः काल 4.30 से दोपहर 12.30  तक

सायं काल 4.00 से रात्री 10.00 तक    

इनके अलावा हर महीने की शुक्ल पक्ष एकादशी को मंदिर 24 घंटे खुला रहता है।

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