Wednesday, July 15, 2020

सोमनाथ मंदिर Somnath Temple

सोमनाथ महादेव मंदिर की कहानी, महत्त्व, इतिहास और वास्तुकला Story, Significance, History and Architecture of Somnath Mahadev Temple

सोमनाथ महादेव ज्योतिर्लिंग

सोमनाथ मंदिर की पौराणिक कहानी / Mythological story of Somnath Temple

पुराणों में वर्णित सोमनाथ महादेव की कथा के अनुसार, प्राचीन काल में प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियाँ थी। प्रजापति दक्ष ने उन सभी का विवाह चंद्रदेव से किया था। परन्तु चंद्रदेव उन सब में से रोहिणी को सबसे अधिक पसंद करते थे और उनके साथ ही सबसे अधिक समय बिताते थे। यह सब देख कर चंद्रदेव की अन्य पत्नियाँ  बहुत दुखी रहा करती थी। उन सभी ने इस बात को लेकर अपने पिता दक्ष से कई बार चंद्रदेव की शिकायत भी की थी। और उनके पिता प्रजापति दक्ष ने चंद्रदेव को कई बार समझाया, परन्तु चंद्रदेव नहीं माने और पहले की ही तरह केवल रोहिणी के संग ही अधिक समय व्यतीत करते रहे। अंततः प्रजापति दक्ष ने चंद्रदेव को क्षय रोग हो जाने का श्राप दे दिया, और चंद्रदेव तुरंत ही क्षय रोग से ग्रसित हो गए।
According to the legend of Somnath Mahadev described in the Puranas, Prajapati Daksha had 27 daughters in ancient times. Prajapati Daksha married them all to Chandradeva (Lord of Moon), But Chandradev liked Rohini the most among them and spent the most time with her. Chandradev's other wives used to be very sad to see all this.They all complained to their father Daksha many times about Chandradev, And their father Prajapati Daksha explained to Chandradeva many times. But Chandra Dev did not agree, And as before, only he spent more time with Rohini. Finally, Prajapati Daksha cursed Chandradev to get tuberculosis, and Chandradev immediately suffered from Tuberculosis.

क्षयरोग से ग्रसित होने के बाद चंद्रदेव का समस्त सौन्दर्य और चमक नस्ट हो गयी और इससे चंद्रदेव अत्यंत दुखी हो गए। क्षयरोग से मुक्त होने के लिए चंद्रदेव अन्य देवताओ को साथ में लेकर ब्रह्मदेव के पास पहुंचे और अपने रोग की सारी कथा सुनाई । ब्रह्मदेव ने चंद्रदेव को क्षयरोग से मुक्त होने के लिए भगवान् शिव की आराधना करने को कहा।
After suffering from tuberculosis, all the beauty and brightness of Chandradev was destroyed, and this made Chandradev very sad. To be free from tuberculosis, Chandradev along with other gods reached Brahmadev, and told the whole story of his disease. Brahmadev asked Chandradeva to worship Lord Shiva to get rid of tuberculosis.

ब्रह्माजी से आज्ञा पाकर चंद्रदेव ने भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर सागर किनारे एक शिवलिंग बनाकर भगवान् शिव की आराधना शुरू की, चंद्रदेव ने कठोर तपस्या करते हुए भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र का 10 करोड़ बार जप किया। चंद्रदेव की कठोर तपस्या से भगवान् शिव प्रसन्न हो गए और प्रकट होकर चंद्रदेव से वरदान मांगने को कहा।
After getting permission from Brahmaji, Chandradev started worshiping Lord Shiva by making a Shivling on the sea shore on the western coast of the Indian subcontinent. Chandra Deva chanted Lord Shiva's Mahamrityunjaya Mantra 100 million times while performing hard austerities. Lord Shiva was pleased with Chandradev's harsh penance and appeared and asked Chandradev to ask for a boon.

चंद्रदेव ने भगवान् शिव से उन्हें प्रजापति दक्ष के श्राप के मुक्त करने की विनती की, भगवान् शिव ने कहा दक्ष के श्राप से पूरी तरह मुक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती परन्तु मै तुम्हे आशीर्वाद देता हूँ की तुम्हारी चमक कृष्ण पक्ष में   धीरे धीरे क्षीण होगी और उसी तरह शुक्ल पक्ष में धीरे धीरे बढ़ती जाएगी।
Chandradev requested Lord Shiva to free him from the curse of Prajapati Daksha, Lord Shiva said that complete liberation cannot be achieved by the curse of Daksha, but I bless you that your brightness will gradually fade in Krishna paksha and in the same way your brightness will increase gradually in Shukla paksha.

भगवान् शिव से वरदान प्राप्त कर चंद्रदेव को संतोष की प्राप्ति हुई, साथ ही चंद्रदेव ने भगवान् शिव से प्रार्थना की, की वे लोगो के कल्याण के लिए सदा के लिए उसी शिवलिंग में माता पार्वती के साथ निवास करें जिसकी उन्होंने पूजा की थी, चंद्रदेव की प्रार्थना स्वीकार करके भगवान् शिव उस शिवलिंग में माता पार्वती के साथ निवास करने लगे।
Chandradev attained satisfaction by receiving a boon from Lord Shiva, as well as Chandradeva prayed to Lord Shiva, that he should live forever with the Goddess Parvati in the same Shivalinga which he worshiped, for the welfare of the people. Accepting the prayer, Lord Shiva resided in that Shivling with Goddess Parvati.

चंद्रदेव को सोम भी कहा जाता है और चंद्रदेव के आग्रह पर ही भगवान् शिव ने उस शिवलिंग में निवास करना स्वीकार किया था, इसलिए यह शिवलिंग सोमनाथ महादेव के नाम से प्रख्यात हुआ।
Chandradev is also called Som and it was on the insistence of Chandradev that Lord Shiva accepted to reside in that Shivalinga, hence this Shivling became popular as Somnath Mahadev.

सोमनाथ मंदिर का महत्व Importance of Somnath Temple

सोमनाथ मंदिर हिन्दुधर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, सोमनाथ महादेव ज्योतिर्लिंग को भारत के 12 प्रमुख ज्योर्तिर्लिंगों में से सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग भारत के सबसे प्राचीनतम तीर्थस्थानों में से एक है।  पुराणों के अनुसार सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का निर्माण स्वयं चंद्रदेव ने स्वर्ण से किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद, शिवपुराण, महाभारत और कई अन्य धार्मिक ग्रंथो में किया गया है।
Somnath Temple is a very important and famous religious place in Hinduism, Somnath Mahadev Jyotirlinga is considered to be the first of the 12 major Jyotirlingas of India. This Jyotirlinga is one of the oldest pilgrimage centers in India. According to the Puranas, Somnath Jyotirlinga temple was built by Chandradev himself with gold, Which is mentioned in Rigveda, Shivpuran, Mahabharata and many other religious texts.

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग जहाँ स्थित है यह क्षेत्र पहले प्रभास क्षेत्र नाम से जाना जाता था और यह वही क्षेत्र है जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने यदुवंश का नाश होने के बाद अपनी देह का त्याग किया था।
The area where Somnath Jyotirlinga is located was earlier known as Prabhas Kshetra. This is the same area where Lord Krishna sacrificed his body after the destruction of Yaduvansh.

सोमनाथ मंदिर भारतवर्ष के गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में अरब सागर के किनारे स्थित है, प्राचीनकाल में यह मंदिर अत्यंत वैभवशाली था जिसकी भव्यता आश्चर्यजनक थी, इस मंदिर में स्थित ज्योतिर्लिंग चुंबकीय शक्ति द्वारा हवा में झूलता था, इस मंदिर के वैभव और अकूत सम्पदा को देखकर मुस्लिम आक्रांताओ द्वारा इस मंदिर को कई बार लुटा गया और नस्ट किया गया। परन्तु हिन्दू राजाओं और भक्तों में इस मंदिर के प्रति अथाह श्रद्धा होने के कारण हर बार इस मंदिर का पुनःनिर्माण उसी भव्यता, वैभव और श्रद्धा के साथ किया गया।
Somnath Temple is located on the banks of Arabian Sea in Saurashtra region of Gujarat state of India, This temple was very magnificent in ancient times, whose grandeur was amazing, The Jyotirlinga situated in this temple used to swing in the air by magnetic force. Seeing the splendor and immense wealth of this temple, this temple was looted and destroyed many times by the Muslim invaders. But every time the temple was rebuilt with the same grandeur, splendor and reverence due to the immense reverence of this temple among the Hindu kings and devotees. 

वर्तमान में जो मंदिर अस्तित्व में है इसका पुनर्निर्माण स्वतंत्र भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के द्वारा किया गया था,  भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने इस मंदिर के विषय में कहा था की यह मंदिर विनाश के ऊपर निर्माण की जीत का प्रतिक है।
The temple that currently exists was reconstructed by the first Deputy Prime Minister of independent India, Sardar Vallabhbhai Patel, The first President of India. Dr. Rajendra Prasad had said about this temple that this temple is a symbol of the victory of construction over destruction.

सोमनाथ मंदिर का इतिहास History of Somnath Temple

पौराणिक हिन्दूग्रंथो के अनुसार सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है, तथा ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार भी इसा से पूर्व सोमनाथ मंदिर के स्थान पर एक भव्य मंदिर होने के प्रमाण मिलतें हैं।
According to the mythological Hindu scriptures, the history of Somnath Jyotirlinga is thousands of years old, and according to historical documents, there is evidence of a grand temple in place of Somnath temple before Isa.

ऐतिहासिक दस्तावेजों में सोमनाथ मंदिर को कई बार मुस्लिम आक्रांताओ द्वारा तोड़े और लुटे जाने तथा हिन्दू शासकों द्वारा हर बार इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराये जाने के प्रमाण मिलते है।

In the historical documents, there is evidence of Somnath temple being broken and looted by the Muslim invaders several times, and every time the temple was rebuilt by the Hindu rulers.

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार सोमनाथ मंदिर का सर्वप्रथम निर्माण किसने और कब करवाया यह अज्ञात है,  दूसरी बार इस मंदिर का पुनःनिर्माण 649 ईस्वी में वैल्लभी के यादव राजाओं ने करवाया, उस मंदिर को 725 ईस्वी में सिंध का सूबेदार अल जुनैद ने राजस्थान और गुजरात में लूटपाट कर वापस लौटते समय तुड़वा दिया।
According to historical documents, who and when the first construction of Somnath temple was made is unknown, The temple was rebuilt for the second time in 649 by the Yadav kings of Vellabhi, that temple was destroyed by Al Junaid, the Subedar of Sindh in 725.

815 ईस्वी में प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय ने उसी स्थान पर लाल बलुआ पत्थरों से एक विशाल और अति भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर की कीर्ति और वैभव के किस्से दूर दूर तक फैले थे जिनका वर्णन उस समय के अरब यात्री अल बेरुनी ने अपने भारत यात्रा के वृतांत में भी किया था।
In 815 Pratihara king Nagabhatta II built a huge and very magnificent temple with red sandstone at the same place. Tales of the fame and splendor of this temple spread far and wide which were also described by the then Arab traveler Al Beruni in his travelogue to India.

अल बेरुनी के यात्रा वृतांत से प्रभावित होकर गजनी के मुस्लिम शासक महमूद गजनवी ने 1025 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर की सम्पदा लूटने के लिए आक्रमण किया। महमूद गजनवी 5000 सैनिकों को लेकर मंदिर पंहुचा उस समय मंदिर में 25000 लोग पूजा कर रहे थे। महमूद गजनवी ने उन सभी निहत्ते लोगो पर हमला कर दिया और लगभग सभी लोगों को क्रूरता से मार दिया। इतिहासकरों के अनुसार महमूद गजनवी ने उस समय सोमनाथ मंदिर से बेहिसाब सम्पदा लूटी थी, यह सम्पदा इतनी अधिक थी की वह अपने साथ लाये गए हजारों घोड़ों और ऊंटों पर जितना लाद के ले जा सकता था वह ले गया और बाकी को उसे वहीँ छोड़ना पड़ा। लूट के धन के अलावा वह हजारों स्त्रियों और बच्चो को भी गुलाम बनाकर अपने साथ ले गया।
Influenced by Al Biruni travelogue, the Muslim ruler of Ghazni, Mahmud Ghaznavi attacked in 1025 to loot the wealth of the Somnath temple. Mahmud Ghaznavi reached the temple with 5000 soldiers, at that time 25000 people were worshiping in the temple. Mahmud Ghaznavi attacked all those unarmed people and brutally killed almost all the people. According to historians, Mahmud Ghaznavi looted uncountable wealth from the Somnath temple at that time, This wealth was so much that he carried as much of the load on the thousands of horses and camels he had brought with him, and he had to leave the rest there. Apart from looting money, he took thousands of women and children as slaves with him.

इसके बाद गुजरात के राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर का पुनःनिर्माण करवाया।  1096 ईस्वी में सिद्धराज ने इस मंदिर के पुननिर्माण के कार्य को आगे बढ़ाया। 1168 ईस्वी में राजा कुमारपाल ने इस मंदिर को विस्तार दिया और इस मंदिर में अनेको रत्न जड़ित करके इसे भव्यता प्रदान की। 
After this, King Bhimdev of Gujarat and King Bhoj of Malwa got this temple rebuilt. In 1096, Siddharaj carried on the task of rebuilding this temple.  In 1168, King Kumarapala expanded this temple and bestowed it magnificence by storing many gems in this temple.

1299 ईस्वी में  दिल्ली के शासक सुल्तान अलाउदीन खिलजी ने गुजरात पर आक्रमण किया और सोमनाथ मंदिर को नस्ट कर उसकी सम्पदा लूट कर ले गया। उसके बाद 1308 ईस्वी में सौराष्ट्र के चूडासामा राजा महिपाल प्रथम ने फिर से इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाय, तथा उसके पुत्र खेंगरा ने 1351 में इस मंदिर में एक भव्य शिवलिंग स्थापित किया ।
In 1299, the ruler of Delhi, Sultan Alauddin Khilji, invaded Gujarat and destroyed the Somnath temple and looted its wealth. Then in 1308, Chudasama King Mahipal I of Saurashtra rebuilt the temple again, and his son Khengra installed a grand Shivling in this temple in 1351.

1395 ईस्वी में गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह प्रथम जिसे जफ़र खान भी कहा जाता था ने सोमनाथ मंदिर को फिर से लूट कर  नस्ट कर दिया। तथा 1451 ईस्वी में सुल्तान महमूद बेगड़ा ने मंदिर को अपवित्र किया। जिसके बाद हिन्दू राजाओं द्वारा फिर से इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया।
In 1395, Sultan of Gujarat Muzaffar Shah I, also known as Jafar Khan, plundered and destroyed the Somnath temple again. and in 1451 Sultan Mahmud Begada desecrated the temple. After which this temple was rebuilt again by Hindu kings.

1665 ईस्वी में मुग़ल सुल्तान औरंगजेब ने सोमनाथ मंदिर को नस्ट करवा दिया, इसके बाद भी जब हिन्दुओ ने मंदिर में पूजा करना नहीं छोड़ा, तो 1702 ईस्वी में औरंगजेब सेना भेजकर पूजा कर रहे हजारों लोगो को मार डाला और एक बार फिर सोमनाथ मंदिर को नस्ट करवा दिया।
In 1665, the Mughal Sultan Aurangzeb destroyed the Somnath temple, even after the Hindus did not stop worshiping in the temple, in 1702 Aurangzeb sent an army and killed thousands of people who were worshiping and once again destroyed the Somnath temple.

औरंगजेब के पतन के बाद सौराष्ट्र और भारत के अधिकांश हिस्सों पर मराठों का अधिकार हो गया, तब 1782 ईस्वी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मुख्य मंदिर के निकट ही एक सोमनाथ महादेव मंदिर का निर्माण करवाया।
After the fall of Aurangzeb, Marathas came to power over Saurashtra and most parts of India, then in 1782, Maharani Ahilyabai Holkar of Indore built a Somnath Mahadev Temple near the main temple.

इसके बाद भारत को अंग्रजो से आजादी मिलने के पश्चात भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल जिन्हे लौह पुरुष भी कहा जाता है उन्होंने मुख्य मंदिर के स्थान पर एक अतिभव्य सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया जो आज वर्तमान में अस्तित्व में है। 11 मई 1951 ईस्वी को इस मंदिर का निर्माण कार्य सरदार वल्लभ भाई पटेल के निधन के पश्चात पूर्ण हुआ था, उस दिन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद इस मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा करके इस मंदिर का उदघाटन किया था और कहा था की यह मंदिर विनाश पर निर्माण की जीत का प्रतिक है।
After this, after India got independence from the British, the first Deputy Prime Minister of India, Sardar Vallabhbhai Patel, also known as Iron Man, built a magnificent Somnath temple in place of the main temple which is currently in existence today. The construction work of this temple was completed after the death of Sardar Vallabhbhai Patel on 11 May 1951, On that day, the first President of India, Dr. Rajendra Prasad inaugurated this temple and said that this temple is a symbol of the victory of construction over destruction.
 
Somnath Mahadev Mandir
सोमनाथ महादेव मंदिर

आज सोमनाथ महादेव मंदिर भारत के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक है, यहां महाशिवरात्रि और अन्य त्यौहार बड़े ही धूमधाम से मनाये जाते है , यहां हर साल देश और विदेशों से 1 करोड़ से अधिक श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन करने आते है।
Today Somnath Mahadev Temple is one of the most prominent temples in India, Mahashivratri and other festivals are celebrated with great pomp here, every year more than 10 million devotees from all over the country and abroad come to see Lord Shiva.

सोमनाथ मंदिर की वास्तुकला Architecture of Somnath Temple

सोमनाथ महादेव मंदिर को चालुक्य स्थापत्य वास्तुशिल्प के आधार पर बनाया गया है, जिसकी जटिल और विस्तृत नक्काशी असाधारण नजर आती है। मंदिर की दीवारों पर पत्थरों में ऐसी अनगिनत मूर्तियाँ उकेरी गयी है जो देखने में जीवंत दिखाई देती है। जिन्हें देखने के लिए देश और विदेश से लोग आते है।
Somnath Mahadev Temple is built on the basis of Chalukya architectural architecture, whose intricate and elaborate carvings look extraordinary. On the walls of the temple, countless such statues have been engraved in the stones, which are seen alive in view, which are visited by people from the country and abroad.

यह मंदिर सात मंजिलो में बना है जिसकी उचाई 155 फ़ीट है, इस मंदिर के सबसे ऊपर पत्थर से एक कलश का निर्माण किया गया है केवल इसी कलश का वजन 10 टन है, इस मंदिर के शिखर पर लगी ध्वजा की लम्बाई 37 फुट है।  मंदिर के प्रवेश द्वार के पास एक फोटो गैलरी बनाई गई है जिसमें मंदिर के खंडहर, उत्खनन और जीर्णोद्धार के तस्वीरें है।
This temple is built in seven floors, with a height of 155 feet, a stone urn has been constructed at the top of this temple, only this urn weighs 10 tons, the length of the flag on the top of this temple is 37 feet. A photo gallery has been erected near the temple entrance containing photographs of the ruins, excavations and renovations of the temple.

भीतर से यहाँ मंदिर तीन भागो में विभजित किया गया है।  मंदिर में प्रवेश करने पर नृत्यमंडप आता है, उसके आगे बढ़ने पर सभा मंडप स्थित है जिसे सभा भवन भी कहतें है और अंत में शिखर के नीचे गर्भगृह स्थित है जिसमे ज्योतिर्लिंग स्थित है।
The temple is divided into three parts from within. On entering the temple comes the Nrityamandapa, on proceeding is the Sabha Mandapa which is also known as Sabha Bhawan and finally the sanctum sanctorum is situated under the summit in which the Jyotirlinga is situated.

सोमनाथ महादेव मंदिर के पास ही इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा बनवाया गया शिव मंदिर भी स्थित है जिसका निर्माण 1782 में करवाया गया था।
A Shiva temple built by Maharani Ahilyabai Holkar of Indore is also located near Somnath Mahadev Temple, which was built in 1782.


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