श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की विस्तृत जानकारी Sree Padmanabhaswamy Temple

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की विस्तृत जानकारी Sree Padmanabhaswamy Temple

 

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का परिचय (Introduction of Sree Padmanabhaswamy Temple)

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर भारत के केरल राज्य के तिरुअनंतपुरम शहर में स्थित भगवान विष्णु का एक विश्व प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। यह मंदिर भारत के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान् विष्णु को समर्पित है, इस मंदिर में भगवान् विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान है। भगवान् विष्णु की यह मूर्ति बहुत ही विशाल और देखने में अत्यंत सुन्दर है। इस मंदिर में भगवान् विष्णु के दर्शन करने के लिए देश और विदेश से प्रतिदिन हजारों भक्त आतें हैं। इस मंदिर की अकूत सम्पदा के कारण यह मंदिर दुनिया का सबसे धनवान मंदिर माना जाता है। 
 
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Sree Padmanabhaswamy Temple

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का महत्त्व Importance of Sree Padmanabhaswamy Temple in Hindi

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के बारे में कहा जाता है की इसका निर्माण 5000 वर्ष पूर्व कलयुग के प्रथम दिन किया गया था। इस मंदिर में स्तिथ भगवान विष्णु की 18 फुट की विशाल प्रतिमा 12000 से अधिक श्रीशालिग्राम पत्थरों को कटुसरकार नामक जड़ी-बूटियों के मिश्रण से जोड़कर बनाई गयी है। 

इस मंदिर में सभी त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाए जाते है और इनके अलावा दो मुख्य वार्षिक उत्सव भी मनाये जाते है,  जिनका नाम पइनकुनि उत्सव और अल्पसि उत्सव हैं। इन वार्षिक उत्सवों में भाग लेने के लिए लाखो की संख्या में श्रद्धालु आतें है, और श्री पद्मनाभस्वामी से सुख-समृद्धि की मंगल कामनाएँ करते हैं। 

 

पइनकुनि उत्सव Painkuni Festival

पइनकुनि उत्सव श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में मार्च-अप्रैल महीने में मनाया जाने वाला एक मुख्य वार्षिक उत्सव है। यह उत्सव 10 दिनों तक मनाया जाता है, इस उत्सव के दौरान प्रत्येक दिन एक अलग विशेष अनुष्ठान किया जाता है। इस त्यौहार के नौवें दिन के अनुष्ठान में त्रावणकोर के शाही परिवार के मुखिया शामिल होतें है। इस उत्सव के दसवें दिन देव प्रतिमाओं के साथ शोभा यात्रा निकली जाती है, जिसमे त्रावणकोर के राजा और शाही परिवार के सभी पुरुष सदस्य शामिल होते है।

 

अल्पसि उत्सव Alpashi Utsavam

अल्पसि उत्सव श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर मेंअक्टूबर-नवंबर महीने में मनाया जाने वाला एक मुख्य वार्षिक उत्सव है। इस उत्सव में देवताओं के लिए समुद्र में पवित्र स्नान किया जाता है। मंदिर से एक विशाल जुलूस शुरू होता है जो शंगुमुगम तट तक जाता है, इस जुलूस की अगुआई त्रावणकोर के शाही परिवार के सबसे प्रमुख व्यक्ति करते है। इस जुलूस में त्रावणकोर के शाही परिवार के साथ कई हाथी, घुड़सवार, सशस्त्र पुलिस और हजारों श्रद्धालु चलते है। इस भव्य और ऐतिहासिक जुलूस का गवाह बनने के लिए लाखों लोग सड़कों पर निकलते है।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में केवल हिन्दू धर्म को मानने वाले लोग ही प्रवेश कर सकते हैं। इस मंदिर में प्रवेश करने के लिए पुरषों के लिए धोती और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य होता है।

 

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का स्थापत्य Architecture of Sree Padmanabhaswamy Temple in Hindi

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर बहुत ही विशाल परिसर में फैला हुआ है, इस मंदिर के निर्माण शैली में द्रविड़ और दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का मिला जुला असर देखने को मिलता है।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के गर्भगृह (जिसे अनंतशयनम कहा जाता है) के अंदर भगवन विष्णु की विशाल प्रतिमा स्थित है। अनंतशयनम में भगवान विष्णु के दर्शन करने के लिए तीन द्वार है। पहले द्वार से भगवान विष्णु के सिर और हाथ के दर्शन होते है, मध्य द्वार से उदर और नाभि क्षेत्र के दर्शन होते है और तीसरे द्वार से पैरो के दर्शन होते है।

गर्भगृह के सामने एक मंच बनाया गया इस मंच का निर्माण ग्रेनाइट पत्थर की एक ही शिला से किया गया है। इस मंच को ओटटक्कल मंडप कहा जाता है, इसका उपयोग देवता को अभिषेक कराने के लिए किया जाता है। इस मंच के पत्थरों से बने हुए खम्बों को सोने से मढ़ा गया है।

मंदिर परिसर में ही श्री कृष्णास्वामी मंदिर भी स्थित है, इनके अलावा मंदिर परिसर में विभन्न स्थानों पर पत्थरों के द्वारा 11 मंडप बनाए गए है, जिनका प्रयोग अलग-अलग धार्मिक कार्यो के लिए किया जाता है।  

मंदिर परिसर में एक आयताकार गलियारा है जिसे श्रीबलीपपुराम कहा जाता है, इस गलियारे को सहारा देने के लिए 365 और 1/4 खम्बे बनाए गए है।

 मंदिर के पूर्वी गलियारे के निकट एक ध्वजा स्थंभ है इसकी उचाई लगभग 80 फ़ीट है, इस स्थंभ को सागवान की लकड़ी से बनाया गया है जिसे पूरी तरह से स्वर्ण से मढ़ा गया है। इस स्थंभ के शीर्ष पर भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ की कलाकृति बनाई गयी है।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के गर्भगृह के पूर्व में गोपुरम स्थित है, यह सात मंजिलों में बना हुआ है। जिसकी उचाई लगभग 35 मीटर है। गोपुरम के शिखर पर 7 स्वर्ण कलश बनाये गए हैं, गोपुरम पर भगवान विष्णु के 10 अवतार उकेरे गए है, इसके अलावा पुरे  गोपुरम को विभिन्न कलाकृतियों से सुसज्जित किया गया है।

मंदिर में प्रवेश करने के लिए दो मुख्य द्वार है जिन्हे पूर्वी द्वार और पश्चिमी कहा जाता है।

मंदिर परिसर के उतर-पूर्व हिस्से में एक विशाल पवित्र सरोवर स्थित है जिसे पद्मतीर्थम सरोवर कहा जाता है। पद्मतीर्थम सरोवर केरल राज्य और भारत के कुछ सबसे पवित्र जलाशयों में से एक है।

पुरे मंदिर परिसर में बहुत ही बारीक़ और सुन्दर नक्काशी की गयी है, पत्थरों में ऐसी कलाकृतियाँ उकेरी गयी है जो देखने में जीवंत प्रतीत होती है। इसके अलावा मंदिर में कई जगह भित्ति चित्र बनाये गए है जो देखने में अत्यंत सुन्दर प्रतीत होतें हैं।

 

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का इतिहास History of Sree Padmanabhaswamy Temple in Hindi

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का सर्वप्रथम निर्माण किसने और कब करवाया इसका कोई ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, परन्तु प्राचीन समय से ही यह किंवदंती चली आ रही है की श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की स्थापना 5000 वर्ष से भी अधिक पहले कलियुग के प्रथम दिन की गयी थी।

एक और किंवदंती के अनुसार कलयुग की शुरुआत के 950 साल बाद एक तुलु ब्राह्मण भक्त मुनि दिवाकर ने श्री पद्मनाभस्वामी जी की मूर्ति को फिर से स्थापित किया और मंदिर को दिव्यता प्रदान की।

ऐतहासिक दस्तावेजों में श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का सर्वप्रथम उल्लेख 9वीं शताब्दी में मिलता है। 9वीं शताब्दी के महान तमिल संत और कवी नम्मालवार ने अपनी रचनाओं में बताया है की उनके समय में श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर और पूरा शहर अकल्पनीय रूप से समृद्ध थे। मंदिर की सभी दीवारें शुद्ध सोने से बनाई गयी थी, पुरे शहर में स्वर्ण का भरपूर प्रयोग किया गया था। मंदिर के साथ पूरा शहर स्वर्ग के सामान प्रतीत होता था।

1459 में श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की छत का पुनर्निर्माण करने के लिए मूर्ति को स्थानांतरित किया गया था। 1461 में गर्भगृह के सामने ओट्टकल मंडप बनाया गया था जिसका निर्माण ग्रेनाइट की एक विशाल शिला से किया गया था।

मंदिर के वर्तमान स्वरुप का पुनर्निर्माण निर्माण 1733 में त्रावणकोर के राजा मार्तण्ड वर्मा द्वारा किया गया था। 1739 में राजा मार्तण्ड वर्मा के संरक्षण में 12000 से अधिक श्रीसालिग्राम पत्थरों को कटुसरकार नामक जड़ी बूटियों के मिश्रण से जोड़कर नयी मूर्ति बनाई गयी।

1750 में राजा मार्तण्ड वर्मा ने स्वयं को श्री पद्मनाभस्वामी का दास घोषित किया और अपने साम्राज्य को श्री पद्मनाभ का प्रतिक माना। उसके बाद से ही त्रावणकोर के राजाओ को श्री पद्मनाभदास कहा जाने लगा जिसका अर्थ भगवन विष्णु के सेवक होता है। त्रावणकोर राज्य की मान्यताओं को पंडरवका (जिसका अर्थ देव स्थान से सम्बंधित) कहा जाने लगा, और राज्य के कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन को पद्मनाभनते पनाम कहा जाने लगा जिसका अर्थ ‘स्वामी द्वारा दिया गया धन’ होता है।  

2011 में कोर्ट के आदेश पर श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के कुछ तहखाने खोले गए थे, उन तहखानों से अनगिनत सोने की वस्तुएं, कीमती आभूषण, और अनगिनत रत्न प्राप्त हुए थे। उस समय तहखानों प्राप्त केवल स्वर्ण का मुल्य ही 22 अरब डॉलर आँका गया था। इस मंदिर का एक विशेष तहखाना अभी भी खोला जाना बाकी है, ऐसा माना जाता है की उस तहखाने के अंदर बाकी सभी तहखानों से प्राप्त कुल धन से भी कई गुना अधिक धन मौजूद है।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का नियंत्रण हमेशा से ही त्रावणकोर साम्राज्य के राजाओं के पास रहा है और भारत की आजादी के बाद भी इस मंदिर के देखरेख त्रावणकोर साम्राजय के वंशज करते हैं।

 

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