Friday, August 14, 2020

त्रेता युग से 2020 तक श्रीराम मंदिर अयोध्या का इतिहास। भाग 1

त्रेता युग से 2020 तक श्रीराम मंदिर अयोध्या का इतिहास।  भाग 1 

श्रीराम-मंदिर-अयोध्या-का-इतिहास

 श्रीराम जन्मभूमि, अयोध्या का पौराणिक इतिहास  

श्री राम जन्मभूमि मंदिर भारत के उत्तरप्रदेश राज्य के अयोध्या नगर में स्थित है, अयोध्या को हजारो सालों से भगवन श्रीराम की जन्मभूमि के रूप में मान्यता प्राप्त है। हिन्दुधर्म के अनुसार भगवान् श्री राम ने त्रेता युग में (आज से लगभग नौ लाख साल पहले) अयोध्या के राजा दशरथ और उनकी पत्नी कौशल्या के पुत्र के रूप में जन्म लिया था। भगवान राम के जीवन की घटनाओ पर उस समय के ऋषि वाल्मीकि ने एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम रामायण है।  रामायण पुस्तक में भगवान् राम के जीवन की प्रत्येक घटना का विस्तार से वर्णन किया गया है, इसलिए हिन्दुधर्म में रामायण को कुछ सबसे पवित्र पुस्तकों में से एक माना जाता है। 

 

रामायण में अयोध्या का संक्षिप्त वर्णन

रामायण पुस्तक में अयोध्या नगरी को भगवान श्री राम की जन्म भूमि बताया गया है। रामायण में बताया गया है ब्रम्हा जी के प्रपोत्र वैववस्त मनु ने कौशल देश की स्थापना की थी, जिसकी राजधानी अयोध्या थी, अयोध्या नगर को सरयू नदी के किनारे बसाया गया था। मनु के पुत्र इक्षवाकु हुए, राजा इक्षवाकु की 39 वीं पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ था, राजा इक्षवाकु के कारण भगवान श्री राम के वंश को इक्षवाकु वंश कहा  जाता है। 

रामायण के अनुसार अयोध्या पर हमेशा से ही इक्षवाकु वंश के सूर्यवंशी राजाओं का शासन रहा है, सूर्यवंशी राजाओं के शासन कल में अयोध्या अत्यंत समृद्ध और सुखी थी, श्रीराम के शासन कल में अयोध्या और कौशल राज का वैभव अपने चरम पर था, महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में अयोध्या के वैभव तुलना स्वर्ग के वैभव से की है। 

 

रामायण की ऐतिहासिकता

रामायण एक ऐसी पुस्तक है, जिसे भारत के अलावा श्रीलंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, बर्मा, कम्बोडिया, मलेशिया, जापान, फिलीपींस तथा और भी कई अन्य देशो में हजारो सालों से पढ़ा और सुनाया जाता रहा है। इतने सारे देशो में रामायण को हजारों सालों से पढ़ा जाता है, रामायण पर आधारित रामलीलाओं का मंचन किया जाता है, इसलिए ऐसा कोई कारण नहीं है की रामायण को एक ऐतिहासिक दस्तावेज ना माना जाये।

 

इसके अलावा श्रीराम अपने वनवास काल के दौरान जिन स्थानों पर गए थे उन सभी स्थानों का रामायण में विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। उन सभी जगहों में से बहुत सी जगह आज भी भारत और श्रीलंका में मौजूद है। रामायण पुस्तक पर बहुत सारा रिसर्च भी किया गया है और अब तक रामायण में वर्णित 200 से अधिक स्थानों का पता लगाया जा चुका है। इनके अलावा रामायण में वर्णित रामसेतु जिसे भगवान श्रीराम ने बनवाया था, वह लाखों सालों के बाद आज भी भारत और श्रीलंका के मध्य समुद्र में स्थित है और अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है। रामायण पुस्तक वर्णित स्थानों का आज उसी जगह पर वास्तव में पाया जाना रामायण को एक पौराणिक पुस्तक के बजाये एक ऐतिहासिक पुस्तक के रूप में सिद्ध करता है। 

 

द्वापर युग में अयोध्या का इतिहास 

 श्रीराम के सरयू  समाधी लेने के बाद अयोध्या कुछ समय के लिए वीरान सी हो गयी, उसके बाद श्री राम के पुत्र कुश ने अयोध्या नगर को फिर से बसाया। कुश के बाद द्वापर युग तक अयोध्या पर सूर्यवंशी राजाओ का ही शासन रहा। द्वापर युग में महाभारत के युद्ध में कौशल राज्य के अंतिम शासक बृहदल की मृत्यु हो गयी। महाभारत के युद्ध के बाद कौशल राज्य समेत पुरे भारतवर्ष पर पांडवो का शासन हो गया लेकिन अयोध्या का श्रीराम की जन्मभूमि के रूप में अस्तित्व बना रहा। 

 

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का पुरातात्विक इतिहास 

द्वापर युग के बाद कुछ काल खंड तक अयोध्या नगरी का कहीं कोई जिक्र नहीं आता, उसके बाद पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्य बताते है की ईसा से 6 शताब्दी पूर्व तक अयोध्या एक शहर के रूप में विकसित हो गया था। उस समय इस शहर को साकेत कहा जाता था। उस समय साकेत नगर भारत के 6 प्रमुख नगरों में था।  ईसा से 5 शताब्दी पूर्व मगध के सम्राट अजातशत्रु ने कौशल प्रदेश और साकेत पर विजय प्राप्त करके अपने अधीन कर लिया। 

 

पुरातात्विक दस्तावेजों के अनुसार तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य वंश के सम्राट अशोक के द्वारा साकेत नगर में कई बौद्ध स्तूपों का निर्माण करवाया गया। सम्राट अशोक के बाद एक से दो शताब्दियों तक साकेत नगर का कोई विवरण नहीं मिलता है। 

 

उसके बाद एक शताब्दी ईसा पूर्व उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने साधु संतो की मदद से अयोध्या नगरी की खोज की थी। सम्राट विक्रमादित्य ने अयोध्या के लुप्त हो चुके वैभव पुनः लौटाया और पुरे नगर का निर्माण करवाया, सम्राट विक्रमादित्य ने अयोध्या नगर में 360 मंदिरो का निर्माण करवाया, इनके अलावा उन्होंने श्रीराम की जन्मभूमि पर एक अतिभव्य  राम मंदिर का निर्माण भी करवाया। यह वही मंदिर था जिसको बाबर के सेनापति के द्वारा 1528 में तोडा गया था। विक्रमादित्य के बाद अयोध्या पर अलग अलग राजाओ का शासन रहा जिनमे पुष्यमित्र शुंग का नाम प्रमुख है। 

 

चौथी शताब्दी के आसपास अयोध्या गुप्त साम्राज्य के अधीन आ गया, गुप्त शासकों ने साकेत नगर को आधिकारिक रूप से इक्षवाकु वंश राजधानी अयोध्या के नाम से मान्यता प्रदान की। इसके अलावा गुप्त शासको ने अयोध्या को और अधिक वैभव प्रदान किया, जिसके बाद गुप्त शासकों ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र से अयोध्या स्थानांतरित कर ली। छठी शताब्दी के समय गुप्त साम्राज्य पर हूणों ने आक्रमण कर दिया, गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद अयोध्या पर मौखरि वंश ने शासन किया। इसके बाद दसवीं शताब्दी तक अयोध्या पर विभिन्न साम्राज्यों का शासन रहा जिनमे हर्ष, और कन्नौज के राजा यशोवर्मन तथा प्रतिहार गुर्जर प्रमुख हैं। इन सभी राजाओं शासन कल में श्री राम मंदिर पर धार्मिक गतिविधियां निर्बाध रूप से जारी थी। 

 

ग्यारवीं शताब्दी में अयोध्या गढवाला राजवंश के अधीन आ गया। गढवालों ने वैष्णववाद को बढ़वा दिया और अयोध्या में कई विष्णु मन्दिरो का निर्माण कराया। उन्होंने श्रीराम को भगवान विष्णु का सबसे महत्वपूर्ण अवतार माना और श्रीराम मंदिर को विस्तार भी दिया, जिसके कारण अयोध्या का तीर्थस्थान के रूप में महत्त्व  अधिक बढ़ गया। 

 

मुस्लिम शासकों की अधीनता में श्रीराम मंदिर का इतिहास 

1192 में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की सेना मुहम्मद गौरी से पराजित हो गयी। पृथ्वीराज चौहान की हार का सबसे प्रमुख कारण था, की इस युद्ध में कन्नौज के राजा जयचंद ने पृथ्वीराज चौहान को धोका देकर मुहम्मद गौरी का साथ दिया था, जिसके कारण पृथ्वीराज चौहान को पराजित होना पड़ा। पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद दिल्ली और अयोध्या समेत पूरा उत्तरी भारत मुहम्मद गौरी के अधीन हो गया। और भारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव पड़ गयी। 

 

दिल्ली सल्नतत के अधीन अयोध्या में हिन्दू तीर्थ यात्रिओ से कर वसूला जाने लगा, तथा मंदिरो को तोडा जाने लगा। ऐसा माना जाता है की 12 वीं शताब्दी तक अयोध्या में श्रीराम के मुख्य मंदिर के अलावा तीन और ऐसे मंदिर थे जो केवल श्री राम को ही समर्पित थे, उन मंदिरो के आज कहीं कोई अवशेष नहीं मिलते है। 

मुहम्मद गौरी के बाद के मुस्लिम शासकों ने भी भारत में मंदिरो को तोड़ने का क्रम जारी रखा, लेकिन फिर भी 15 वीं शताब्दी के अंत तक अयोध्या में श्रीराम का मुख्य मंदिर किसी तरह बचा रहा। ऐसा कहा जाता है की दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोधी के शासन काल तक अयोध्या में श्रीराम का मंदिर मौजूद था। 

 

आगे का इतिहास भाग-2 में

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