Tuesday, September 15, 2020

श्री करणी माता मंदिर के रहस्यमयी चूहे

  श्री करणी माता मंदिर के रहस्यमयी चूहे 

 
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श्री करणी माता मंदिर राजस्थान राज्य के बीकानेर जिले के देशनोक नामक गांव में स्थित है। श्री करणी माता मंदिर में 20,000 से अधिक चूहे रहते है,  मंदिर में इन चूहों को काबा कहा जाता है, ये चूहे पुरे मंदिर परिसर में पाए जातें है। मंदिर में इन चूहों के सैंकड़ो बिल बने हुए है जिनमें ये चूहे रहतें हैं। सुबह और श्याम की आरती के समय मंदिर परिसर में ये चूहे बहुत अधिक संख्या में देखे जा सकते है। मंदिर में चूहों की संख्या इतनी अधिक है, की मंदिर में श्रद्धालुओ को  सावधानी से चलने की सलाह दी जाती है जिससे किसी चूहे को चोट न लगे। 


श्री करणी माता मंदिर में इन चूहों को पहुत पवित्र माना जाता है, इसलिए इस मंदिर में इन चूहों की बहुत अच्छी देखभाल की जाती है। मंदिर प्रशासन और श्रद्धालुओं के द्वारा इन चूहों के लिए उच्च कोटि की खाद्य सामग्री उपलब्ध करायी जाती है, जिसमें हर तरह का अनाज, गाय का दूध, दूध से बनी मिठाइयाँ, पनीर, रोटी, प्रसाद और कई अन्य चीजें शामिल हैं। इस मंदिर में आने वाले सभी श्रद्धालु श्री करणी माता के लिए प्रसाद लेकर आतें है, और वही प्रसाद चूहों को भी खिलाया जाता है। मंदिर में रोजाना हजारों की संख्या में श्रद्धालु आतें है और वे सभी इन चूहों को प्रसाद खिलतें है, इसलिए इस मंदिर में चुहों के भोजन लिए बहुत अधिक मात्रा में खाद्य सामग्री हमेशा उपलब्ध रहती है। 

 

श्री करणी माता मंदिर के चूहों की विशेस्ताएं

 

श्री करणी माता मंदिर में रहने वाले चूहों में कई ऐसी रहस्य्मयी विशेस्ताएं पायी जाती है जो सामान्य चूहों में नहीं पायी जाती। इसलिए इस मंदिर के चूहे वैज्ञानिकों के लिए भी कौतुहल का विषय बने हुए है,  इसलिए इन चूहों पर रिसर्च करने के लिए कई वैज्ञानिक यहाँ आतें हैं। इन चूहों की कुछ विशेस्ताएं इस प्रकार हैं :-

करणी माता मंदिर, Karni Mata Temple
श्री करणी माता मंदिर

श्री करणी माता मंदिर के चूहों को बहुत अधिक मात्रा में खाद्य सामग्री उपलब्ध होती है लेकिन इसके बावजूद यहाँ के चूहे सामान्य आकार के ही रहतें हैं, जबकि सामान्य चूहे बहुत अधिक भोजन मिलने पर बहुत मोटे हो जातें है, और उनका आकर भी बहुत बढ़ जाता है। 

 

सामान्यतः चूहों को बिमारियों का वाहक माना जाता है, लेकिन श्री करणी माता मंदिर में रहने वाले चूहों से सैंकड़ों सालों के इतिहास में कभी कोई बीमारी नहीं फैली, जबकि इस मंदिर में लोगों को चूहों के खाये हुए प्रसाद का वितरण किया जाता है। जब भारत में प्लेग बीमारी का प्रकोप हुआ था, उस समय भी यह मंदिर और पूरा देशनोक गांव इस बीमारी से सुरक्षित था। 

 

 श्री करणी माता मंदिर के चूहे खाद्य सामग्री के अलावा किसी अन्य चीज को नहीं कुतरते और मंदिर की किसी भी चीज को नुक्सान नहीं पहुंचते इसके बावजूद इन चूहों के दांत सामान्य लम्बाई के ही रहतें है। जबकि सामान्य चूहों के दाँत साल में एक से दो इंच लम्बाई तक बढ़ते है, इसलिए अपने दांतों को सामान्य लम्बाई का बनाये रखने के लिए चूहे अपने दांतों से कुछ न कुछ कुतरते रहते है। 


श्री करणी माता मंदिर में कभी भी छोटे चूहे (चूहे के बच्चे) दिखाई नहीं देते, यहां के सभी चूहे एक ही आकर के पाए जाते हैं। 

 

श्री करणी माता मंदिर में हजारों चूहे रहतें है, लेकिन इस मंदिर में चूहों की कोई गंध नहीं आती है, यहां तक की मृत चूहों की भी कोई गंध इस मंदिर में नहीं आती है। 


श्री करणी माता मंदिर के चूहों में विचित्र व्यवहार देखा जाता है, यहाँ के चूहे मंदिर के जिस हिस्से में रहतें है उस हिस्से से बहार नहीं जाते, जैसे गर्भगृह में रहने वाले चूहे गर्भगृह से बहार नहीं जाते, मंदिर के बरामदे में रहने वाले चूहे बरामदे बहार नहीं जाते, गलियारे में रहने वाले चूहे गलियारे से बाहर नहीं जाते, इस प्रकार मंदिर परिसर के अलग अलग हिस्सों में रहने वाले चूहे अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं करते। सामान्य चूहों में यह प्रवृति नहीं पायी जाती है। 


किसी भी ईमारत में चूहों का रहना उस ईमारत के लिए खतरा माना जाता है, चूहे किसी भी ईमारत में बिल बनाकर उस ईमारत की नींव को खोखला कर देते है, जिसके कारण हमेशा उस ईमारत के गिरने का भय बना रहता है। लेकिन श्री करणी माता मंदिर में हजारों चूहे सैंकड़ों सालों से बिल बनाकर रहते हैं, इसके बावजूद मंदिर की ईमारत मजबूती से खड़ी है। 


श्री करणी माता मंदिर के चूहों का महत्त्व

श्री करणी माता मंदिर में रहने वाले सभी चूहे श्री करणी माता की संतान माने जातें है, इस मान्यता के पीछे एक ऐतिहासिक कहानी है जो इस प्रकार है :-

 

श्री करणी माता का जन्म 20 सितंबर 1387 को हुआ था, उनकी माता का नाम देवलदेवी तथा पिता का नाम मेहाजी किनिया था, श्री करणी माता ने बाल्यकाल से ही अनेकों चमत्कार दिखाए इसलिए उन्हें दुर्गा देवी का अवतार माना जाने लगा। 29 वर्ष की आयु में श्री करणीजी का विवाह साठिका गांव में देपाजी बिठू के साथ किया गया। विवाह के बाद जब बारात साठिका गांव के लिए रवाना हुई तब मार्ग में श्री करणी माता ने देपाजी को देवी दुर्गा के  रूप में दर्शन देकर कहा की मेरा यह जन्म लोगो का कल्याण करने के लिए हुआ है इसलिए आप मुझसे ग्रहस्त संबंध नहीं रख सकते, इसलिए आप अपनी ग्रहस्ती चलाने के लिए मेरी छोटी बहन गुलाबबाई से शादी कर लीजिये। इस प्रकार श्री करणी माता की सहमति से गुलाबबाई और देपाजी का विवाह संपन्न हुआ। 


गुलाबबाई और देपाजी को चार पुत्र और एक पुत्री की प्राप्ति हुई। पुत्रों के नाम पुण्यराज, नागराज, सिद्धराज और लक्ष्मणराज थे और पुत्री का नाम रेडीबाई रखा गया। इन सभी को श्री करणी माता अपनी ही संतान मानती थी और बहुत अधिक स्नेह करती थी। 


एक दिन श्री करणी माता का सबसे छोटा पुत्र लक्ष्मणराज कोलायत के तालाब में डूब गया, जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। लक्ष्मणराज की मृत्यु होने पर गुलाबबाई विलाप करते हुए श्री करणी माता के पास पहुंची और लक्ष्मणराज को पुनः जीवित करने की प्रार्थना करने लगी। श्री करणी माता ने लक्ष्मणराज का शव अपनी कुटिया में रखवा दिया और स्वयं उसके पास ध्यान में बैठ गयी। तीन दिन तक श्री करणी माता ध्यानमग्न रहीं जिसके बाद लक्ष्मणराज पुनः जीवित हो गया। लक्ष्मणराज के पुनः जीवित होने से सारे परिवार में ख़ुशी की लहर छा गयी। 


लक्ष्मणराज को जीवित करने के बाद श्री करणी माता ने अपने चारों पुत्रों को आशीर्वाद दिया, की मेरे सभी चारों पुत्र मेरे जीवनकाल तक जीवित रहेंगे, और बाद में ऐसा ही हुआ, श्री करणी माता के 151 वर्ष लम्बे जीवनकाल तक उनके सभी पुत्र जीवित थे। लक्ष्मणराज को जीवित करने के बाद श्री करणी माता ने अपने वंशजों के लिए कोलायत के तालाब को वर्जित कर दिया। आज भी श्री करणी माता के वंशज (देपावत) इसका पालन करतें है और कोलायत के तालाब के पानी को स्पर्श भी नहीं करते है। 


 ऐसा कहा जाता है, की जब तालाब में डूबने से लक्ष्मणराज की मृत्यु हुई थी, तब श्री करणी माता लक्ष्मणराज का जीवन वापस लेने के लिए मृत्यु के देवता यमराज के पास गयी थी। तब यमराज ने कहा की यहाँ आने के बाद कोई वापस नहीं जा सकता, यदि आप अपने पुत्र के प्राण यहां से वापस लेकर जाती है, तो भविष्य में आपके परिवार के किसी सदस्य के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं होगा। तब श्री करणी माता ने कहा ठीक है आज के बाद मेरा कोई वंशज आपके यहां नहीं आएगा। तभी से श्री करणी माता के परिवार (देपावत परिवार) में जब किसी की मृत्यु होती है तो वह श्री करणी माता मंदिर में चूहा बन जाता है, और जब मंदिर में किसी चूहे की मृत्यु होती है तो उसका जन्म श्री करणी माता  के परिवार (देपावत परिवार) में होता है। श्री करणी माता मंदिर में रहने वाले चूहों को काबा कहा जाता है। 

 

श्री करणी माता  मंदिर रहने वाले सभी चूहे (काबा) श्री करणी माता की संतान (उनके वंशज) माने जाते है। ऐसा माना जाता है की श्री करणी माता के वंशजों को उनके कर्मो के अनुसार मंदिर में अलग-अलग स्थानों पर निवास मिलता है, जैसे अच्छे कर्म करने वालों को मंदिर के गर्भगृह में स्थान मिलता है तथा बुरे कर्म करने वालों को मंदिर में किसी अन्य जगह स्थान मिलता है। और मंदिर परिसर में भी चूहों का विचित्र व्यवहार स्पष्ट देखा जा सकता है, जैसे की चूहे अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं करते, जो चूहा मंदिर परिसर के जिस हिस्से में रहता है वह वहाँ से मंदिर के किसी अन्य स्थान पर नहीं जाता। 

 श्री करणी माता मंदिर में चूहों को बहुत पवित्र माना जाता है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को यह सलाह दी जाती है की वे मंदिर में सावधानीपूर्वक चलें जिससे किसी चूहे को कोई चोट ना पहुंचे। श्री करणी माता मंदिर में सफ़ेद चूहे का देखा जाना बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है की सफ़ेद चूहा दिखने पर मनोकामना पूर्ण हो जाती है। 


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