Wednesday, September 9, 2020

श्री करणी माता मन्दिर, A Temple where 20K Rats live, Karni Mata Temple

 A Temple where 20K Rats live. Sri Karni Mata Temple / श्री करणी माता मन्दिर

Sri Karni Mata Temple, Deshnok, Bikaner

श्री करणी माता मंदिर भारत में एक प्रसिद्ध हिंदु मन्दिर है, यह भारत के राजस्थान राज्य के बिकानेर जिले के देशनोक गांव में स्थित है। इस मंदिर में श्री करणी माता की पूजा की जाती है, श्री करणी माता का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था, श्री करणी माता के बचपन नाम रिधुबाई था। श्री करणी माता के आशीर्वाद से ही जोधपुर और बीकानेर राज्यों की स्थापना हुई थी। बीकानेर राजघराने के लोग श्री करणी माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजतें हैं। श्री करणी माता ने अपने जीवनकाल में कई चमत्कारिक घटनाएं की, जिनके कारण उन्हें दुर्गा देवी का अवतार माना जाने लगा। श्री करणी माता ने अपने 151 वर्ष लम्बे जीवनकाल के बाद 1538 स्वयं को योग अग्नि के द्वारा भस्म कर लिया था। जिसके बाद उनके भक्त उनका एक  मंदिर बनाकर उनकी पूजा करने लगे, जो की उस समय से लेकर आज तक निरंतर जारी है। 

Sri Karni Mata Temple is a famous Hindu temple in India, it is located in Deshnok village in Bikaner district of Rajasthan state, India. Sri Karani Mata is worshiped in this temple, Shri Karani Mata was born in a Charan family in 1387, The childhood name of Shri Karni Mata was Ridhubai. The states of Jodhpur and Bikaner were established only with the blessings of Shri Karni Mata. People of Bikaner royal family worship Shri Karni Mata as their Kuldevi. Shri Karni Mata did many miraculous events during her lifetime, due to which she was considered an incarnation of Durga Devi. Shri Karni Mata, after her 151 years long life, consumed herself in 1538 by the fire of yoga. After which her devotees started worshiping her by building a temple, which has continued continuously from that time till today.

 

श्री करणी माता मंदिर में बीस हजार से अधिक चूहे रहतें हैं, ये चूहे मंदिर में हर जगह घुमते रहतें हैं, मंदिर में चूहों की संख्या इतनी अधिक है की मंदिर में श्रद्धालुओं को अपने पैर घसीटते हुए चलना पड़ता है, जिससे की कोई चूहा पैर के नीचे कुचला न जाये। श्री करणी माता मंदिर में चूहों को काबा कहा जाता है तथा यह सभी चूहे श्री करणी माता की संतान माने जातें हैं। 

There are more than twenty thousand rats living in Shri Karni Mata temple, these mice roam everywhere in the temple, The number of rats in the temple is so high that the devotees have to drag their feet while walking in the temple, so that no rat is crushed under the foot. Rats in Sri Karni Mata temple are called Kaaba and all these rats are considered to be children of Sri Karni Mata. 


श्री करणी मातामंदिर की विशेस्ताएं Specialties of Shri Karni Mata Temple

श्री करणी माता मंदिर में हर साल लाखों की संख्या में भक्त करणी माता के दर्शन करने आते है। नवरात्रों के दौरान इस मन्दिर में भक्तो की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है। इस मंदिर में भक्त श्री करणी माता से सुख और समृद्धि कामना करते है। इस मंदिर में हजारों चूहों के साथ कुछ सफ़ेद चूहे भी रहतें हैं, ऐसा माना जाता है की इस मंदिर में सफ़ेद चूहा दिखाई देने पर मनोकामना पूर्ण हो जाती है। 

Every year lakhs of devotees visit Shri Karni Mata temple to see Karni Mata. During the Navratras the number of devotees in this temple increases a lot. Devotees in this temple wish happiness and prosperity to Shri Karni Mata. There are thousands of rats in this temple and some white rats are also there, it is believed that the desire is fulfilled when a white mouse appears in this temple.


श्री करणी माता मंदिर में कुछ चमत्कार प्रत्यक्ष देखे जा सकते है, जैसे की मंदिर में इतनी अधिक मात्रा में चूहे होने के बावजूद मंदिर में चूहों की कोई गंध नहीं आती, इसके अलावा मंदिर के पांच सौ साल के इतिहास में चूहों के कारण कभी कोई बीमारी नहीं फैली जबकि मंदिर में प्रतिदिन चूहों के खाये हुए प्रसाद का वितरण किया जाता है। यहाँ तक की भारत में जब प्लेग बीमारी फैली थी, उस समय भी यह मंदिर और पूरा देशनोक क़स्बा प्लेग से पूरी तरह से सुरक्षित था। मंदिर में इतनी अधिक संख्या में चूहे होने बावजूद कभी कोई चूहा मंदिर परिसर के बहार नहीं देखा जाता।  

Some miracles can be seen directly in the Sri Karni Mata temple, such that despite having such a large amount of rats in the temple, there is no smell of mice in the temple, Apart from this, no disease has ever spread due to mice in the history of the temple's five hundred years, while the offerings of the rats are eaten daily in the temple. Even at the time when plague disease spread in India, this temple and the entire Deshnok town was completely safe from plague. Despite having such a large number of rats in the temple, no rat is ever seen outside the temple premises.

 

श्री करणी माता मंदिर में रहने वाले चूहों में ऐसी कई विशेस्ताएं पायी जाती हैं जो सामान्य चूहों नहीं पायी जाती जैसे :- 

Many such specialties are found in the mice living in Shri Karni Mata temple which are not found in normal mice such as: - 

मंदिर के सभी चूहे एक ही आकर के हैं All the rats of the temple belong to the same size

श्री करणी माता मंदिर के सभी चूहे एक ही आकार के दिखाई देते है उनमें कहीं कोई छोटा चूहा या बड़े आकर का मोटा चूहा दिखाई नहीं देता। मंदिर में चूहों को हर प्रकार का उच्च कोटि का पौस्टिक भोजन बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध रहता है, लेकिन इसके बावजूद चूहे मोटे नहीं होते और सभी चूहे एक ही आकर के पाए जाते है। जबकि सामान्य चूहे बहुत अधिक भोजन मिलने पर मोटे और आकर में बड़े हो जातें हैं। 

All the rats of Shri Karni Mata temple appear to be of the same size, there is no small rat or big size fat mouse. Every type of high quality nutritious food is available to the rats in the temple in a large quantity, but despite this the rats are not obese and all the rats are found in the same size. Whereas normal rats grow fat and shapely when they get too much food. 


मंदिर के चूहों के दाँत ज्यादा लम्बे नहीं बढ़ते  The teeth of the temple rats do not grow long.

इस मंदिर के चूहे किसी भी चीज को दांतो से नहीं कुतरते हैं, इसके बावजूद इन चूहों के दांत सामान्य लम्बाई के ही रहतें हैं, जबकि सामान्य चूहों के दाँत बहुत तेजी से बढ़ते है, और उनके दांत एक साल में एक से दो इंच तक बढ़ कर जबड़ों को चीर सकते है। इसलिए सामान्य चूहे किसी भी चीज को दांतो से कुतर कर अपने दांतो की लम्बाई सामान्य बनाये रखते है। 

The rats of this temple do not scrape anything with teeth, yet the teeth of these mice remain of normal length, While the teeth of normal mice grow very fast, and their teeth grow by one to two inches in a year, they can rip the jaws. That's why normal mice keep their teeth normal by scraping any thing from teeth.


मंदिर के चूहे विचित्र अनुशासन का पालन करते है  Temple rats do follow a strange discipline

इस मंदिर के चूहों में एक अनुशासन पाया जाता है, गर्भगृह में रहने वाले चूहे गर्भगृह से बहार नहीं जाते, इसी प्रकार मंदिर के बरामदे में रहने वाले चूहे गर्भगृह में नहीं आते, श्री करणी माता मंदिर परिसर में बने अन्य छोटे मंदिरो में रहने वाले चूहे वहां से किसी अन्य जगह पर नहीं जाते, गलियारे में रहने वाले चूहे गलियारे से बहार नहीं जाते। इस प्रकार एक विचित्र अनुशासन यहां के चूहों में पाया जाता है जो अन्य स्थानों पर पाए जाने वाले सामान्य चूहों  में देखने को नहीं मिलता। 

A discipline is found in the rats of this temple, the rats living in the sanctum sanctorum do not go out of the sanctum. Similarly, the rats living in the temple verandah do not come to the sanctum sanctorum. The rats living in other small temples built in the Sri Karni Mata temple complex do not go anywhere else, the rats living in the corridor do not go out of the corridor. Thus a peculiar discipline is found in the rats here which are not found in normal mice found elsewhere. 


श्री करणी माता मंदिर में हजारों चूहे रहतें है परन्तु इस मंदिर में चूहों की कोई गंध नहीं आती है, यहां तक की मृत चूहों की भी कोई गंध मंदिर में नहीं आती, जो की आश्चर्यजनक है। 

There are thousands of rats in the temple of Shri Karni Mata, but there is no smell of mice in this temple, even dead mice do not have any smell in the temple, which is amazing.

 

श्री करणी माता की संक्षिप्त जीवनी Brief biography of Shri Karni Mata

श्री करणी माता के पिता का नाम मेहाजी किनिया था, तथा माता का नाम देवल देवी था। मेहाजी कीनिया की पांच पुत्रियां थी परन्तु उनके एक भी पुत्र नहीं था। पुत्र प्राप्ति के लिए मेहाजी किनिया ने वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में स्थित श्री हिंगलाज माता मंदिर की कठिन यात्रा की। मेहाजी किनिया के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर श्री हिंगलाज माता ने उनको दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा तब मेहाजी कीनिया ने कहा की मैं चाहता हूँ की मेरा नाम हमेशा चलता रहे और भविष्य में भी लोग मुझे जाने। श्री हिंगलाज माता ने कहा ऐसा ही होगा और यह कहकर वह अन्तर्धान हो गयी। 

Shri Karni Mata's father's name was Mehaji Kiniya, and mother's name was Deval Devi. Mehaji Kenya had five daughters but did not have a single son. To get a son, Mehaji Kiniya made a difficult trip to Sri Hinglaj Mata Temple located in Balochistan province of present-day Pakistan. Pleased with the devotion of Mehaji Kiniya, Shri Hinglaj Mata appeared to him and asked him to ask for a boon, then Mehaji Kenya said that I want my name to continue forever and people will know me in future also. Sri Hinglaj Mata said that this will happen and after saying that she disappeared.

 

उसके बाद मेहाजी की पत्नी देवल देवी को गर्भ रहा और इस बार मेहाजी को पुत्र प्राप्ति की पूरी आशा थी, परन्तु उनकी पत्नी को 21 माह की आश्चर्यजनक रूप से लम्बी गर्भवस्था के बाद 20 सितम्बर 1387 ई को एक कन्या  की प्राप्ति हुई। इस कन्या का मुँह चौड़ा, रंग गहरा और शरीर स्थूल था, कन्या का नाम रिघुबाई रखा गया, रिघुबाई एक चमत्कारिक कन्या थी, उन्होंने समय समय पर कई चमत्कार दिखाकर अपनी दैवीय शक्ति का प्रदर्शन किया। जिसके कारण उन्हें दुर्गा देवी का अवतार करणी माता कहा जाने लगा। 

After that Mehaji's wife Deval Devi was pregnant and this time Mehaji had full hope of getting a son. But his wife got a girl on 20 September 1387 AD after an amazingly long pregnancy of 21 months. This girl had a wide mouth, dark complexion and a gross body, the girl was named Righubai, Righubai was a miracle girl. she demonstrated her divine power from time to time by performing many miracles. Due to which she was called Karani Mata, an incarnation of Durga Devi.

 

श्री करणीजी का विवाह साठिका गांव में केलूजी बिठू के पुत्र देपाजी के साथ तय किया गया।  1416 में 29 वर्ष की आयु में श्री करणीजी का विवाह देपाजी बिठू के साथ किया गया, परन्तु देपाजी श्री करणीजी के रूप के कारण इस विवाह से खुश नहीं थे। विवाह के बाद मेहाजी कीनिया ने बारात को तीन-चार दिन तक अपने यहां रखकर वर-वधु को विदाई दी और वर-वधु बारात साथ साठिका गांव के लिए रवाना हुए। 

Shri Karaniji's marriage was decided with Depaji, son of Keluji Bithu, in the village of Sathika. In 1416, at the age of 29, Srikaraniji was married to Depaji Bithu, but Depaji was not happy with this marriage due to the form of Shri Karaniji. After marriage, Mehaji Keniya kept the wedding procession for three to four days and bid farewell to the bride and groom and the bride and groom left for the village of Sathika with the wedding procession.

 

 मार्ग में श्री करणीजी ने देपाजी को देवी दुर्गा के रूप में दर्शन दिए और कहा की मैं आपकी सहधर्मिणी अवश्य हूँ, लेकिन मेरा यह जन्म दीन-दुखियो की सेवा और उनकी रक्षा करने के लिए हुआ हैं। मेरा पिछले जन्म में अत्यंत सुन्दर रूप था जिसके कारण मुझे अपने कर्त्तव्य पूर्ति में बहुत सारी बाधाएं आयी थी, इसलिए इस जन्म में मैंने यह विरुप भौतिक शरीर धारण किया है ताकि इस जन्म में उन बाधाओं की पुनरावृति न हो। इसलिए आप मुझसे गृहस्त संबंध नहीं रख सकते, अतः आप अपनी गृहस्ती चलाने के लिए मेरी छोटी बहन गुलाबबाई से विवाह कर लेना, वह आपकी गृहस्ती को बहुत अच्छे से संभाल लेगी। ऐसा कहकर श्री करणीजी पुनः अपने मानव रूप में आ गयी, देपाजी को यह सब भ्रम के समान प्रतीत हुआ और वे बारात के साथ मार्ग में आगे बढ़ गए। 

On the way, Shree Karananiji appeared to Depaji as Goddess Durga and said that I am definitely your companion, but I born to serve and protect the oppressed. I had a very beautiful form in my previous life, due to which I faced many obstacles in my duty fulfillment, so in this birth I have assumed this physical body so that those obstacles are not repeated in this birth. so, you cannot have a homely relationship with me, so to marry my younger sister Gulabbai to run your household, she will handle your household very well. Saying this, Shri Karaniji returned to his human form, All this seemed like an illusion to Depaji and he proceeded along the wedding procession.

 

कुछ दिन की यात्रा के बाद बारात साठिका गांव पहुंच गयी। देपाजी के पिता इस विवाह से अत्यंत प्रसन्न थे क्योकि श्री करणीजी के रूप में स्वयं देवी दुर्गा उनके घर में पुत्रवधु के रूप में पधारी थी। कुछ दिन बाद श्री करणीजी ने देपाजी से फिर से कहा की आप गृहस्ती चलाने के लिए मेरी छोटी बहन गुलाबबाई से शादी कर लो। यह सुनकर देपाजी को मार्ग में देवी दुर्गा की कही बात याद आ गयी। देपाजी श्री करणीजी के साथ विवाह करके खुश नहीं थे इसलिए उन्होंने सहर्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, क्योकि उन्होंने गुलाबबाई को देख रखा था वह बहुत सुन्दर थी। इस प्रकार श्री करणीजी की सहमती से देपाजी और गुलाबबाई का विवाह तय हो गया। 1417 में देपाजी और गुलाबबाई विवाह संपन्न हुआ।

 After a few days' journey, the procession reached the village of Sathika. Deepaji's father was very happy with this marriage as Goddess Durga herself as a daughter-in-law in his house, as Sri Karanji. A few days later, Shree karaniji again told Deepaji that you should marry my younger sister Gulabbai to run a family.  Hearing this, Depaji remembered the words of Goddess Durga on the way. Depaji was not happy with getting married to Shri Karaniji, so he gladly accepted the offer, as he had seen Gulab Bai, she was very beautiful. Thus, the marriage of Depaji and Gulabbai with the consent of Shri Karaniji was decided. In 1417, Deepaji and Gulabbai married.

 

इसके बाद श्री करणीजी जनकल्याण के कार्यों में लग गयी और उन्होंने अपने 151 वर्ष लम्बे जीवनकाल में अनगिनत चमत्कार दिखाए और लोगों का कल्याण किया, जिनके कारण उनकी ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गयी। और लोग उन्हें करणी माता कहकर बुलाने लगे। साधारण जनमानस के अलावा उस समय के कई राजपूत राजा और सरदार श्री करणी माता के अन्नय भक्त थे जिनमें से कुछ प्रमुख नाम इस प्रकार है :- जैसलमेर के रावल : चाचगदेव, रावल देवीदास, रावल घड़सी और महारावल जैतसी, मारवाड़ के शासक: राव चूंडा, राव रिड़मल, राव जोधा (जोधपुर राज्य के संस्थापक) और राव बीका (बीकानेर राज्य के संस्थापक), राव बिका के पुत्र राव लूणकरण, राव लूणकरण के पुत्र राव जैतसी, पूंगल के शासक: शेखा भाटी,  आदि नाम प्रमुख हैं। 

After this, Shri Karaniji got involved in the works of Public welfare and she showed countless miracles and welfare of people during her 151 years long life, due to which her fame spread far and wide, And people started calling her as Karni Mata. Apart from the general public, many Rajput kings and chieftains of that time were devotees of Shri Karni Mata, some of the prominent names are as follows: - Rawals of Jaisalmer: Chachagdev, Rawal Devidas, Rawal Ghadasi and Maharawal Jaitsi. Rulers of Marwar: Rao Chunda, Rao Riddmal, Rao Jodha (founder of the state of Jodhpur) and Rao Bika (founder of Bikaner state), Rao Lunkaran (son of Rao Bika), Rao Jaitasi (son of Rao Lunakaran). Ruler of Pungal: Shekha Bhati, etc. are prominent. 

 

एक दिन श्री करणी माता ने अपने परिवार से सभी सदस्यों को बुलाकर कहा की मुझे इस भौतिक शरीर को धारण किये हुए 150 वर्ष हो चुके है इसलिए अब मैं इस भौतिक शरीर को छोड़ना चाहती हूँ। इसलिए अब मैं यहाँ से जैसलमेर जाकर श्री तेमड़ाराय के दर्शन करूंगी, उसके बाद अपनी बहनों से मिलने खारोडा (वर्तमान में सिंध, पाकिस्तान) जाउंगी, और वहाँ से वापस आते समय रास्ते में मैं अपना भौतिक शरीर छोड़ दूंगी। यह सुनकर परिवार के सभी सदस्य दुखी हो गए और श्री करणी माता के साथ चलने की प्रार्थना करने लगे, लेकिन श्री करणी माता ने उन्हें अपने साथ चलने से मना कर दिया।  परिवार के अन्य सदस्य तो मान गए परन्तु उनके सबसे बड़े पुत्र पुण्यराज ने साथ में चलने का हट किया। तब श्री करणी माता ने कहा की मेरे ज्योतिर्लिन होने की घटना को देखना तुम्हारे भाग्य में नहीं लिखा है और तुम्हारी आयु 117 वर्ष हो चुकी है, इसलिए तुम्हे मेरे साथ चलने की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन पुण्यराज नहीं माने, जिसके बाद श्री करणी माता ने उन्हें अपने साथ चलने की अनुमति दे दी। इस यात्रा में में श्री करणी माता के साथ उनके पुत्र पुण्यराज, रथवान सरंगिया विशनोई, और एक सेवक थे। 

One day Shri Karni Mata called all the members from her family and said that it has been 150 years since I was having this physical body, so now I want to leave this physical body. So now I will go to Jaisalmer  to see Sri Temdaray, then go to Kharoda (presently Sindh, Pakistan) to meet my sisters, and I will leave my physical body on the way back from there. Hearing this, all the family members became unhappy and prayed to go with Shri Karni Mata, but sri  Karni Mata refused them to come with her. Other members of the family agreed, but her eldest son Punyaraj insisted on to go with her. Then Shri Karni Mata said that it is not written in your destiny to see the incident of merging me in light, and you are 117 years old, so you have no need to come with me, But Puniraj did not agree, after which Shri Karni Mata Allowed him to come with her. In this yatra, Shri Karani Mata was accompanied by his son Punyaraja, Rathwan Sarangia Vishanoi, and a servant.


इसके बाद श्री करणी माता ने जैसलमेर पहुंचकर श्री तेमड़ाराय के दर्शन किये, वहाँ पर जैसलमेर के महारावल ने श्री करणी माता का स्वागत किया। जैसलमेर प्रवास के दौरान श्री करणी माता अपने भक्त बन्ना खाती के घर पहुंची और उसे अपनी मूर्ति बनाने के लिए कहा। तब बन्ना खाती ने कहा की मैं जन्म से अँधा हूँ मैं आपकी मूर्ति कैसे बना सकता हूँ। तब श्री करणी माता ने बन्ना खाती की आँखों में देखा, जिससे उसे सबकुछ दिखाई देने लगा। इसके बाद श्री करणी माता ने बन्ना खाती को वह रूप दिखाया जिसकी मूर्ति बनायीं जानी थी, और मूर्ति बनाकर देशनोक पहुंचाने का आदेश दिया। तब बन्ना खाती ने निवेदन किया की देशनोक बहुत दूर है मैं मूर्ति लेकर वहां कैसे पहुँचूँगा। तब श्री करणी माता ने कहा मूर्ति पूरी होने के बाद तुम उसे अपने सिर के नीचे रखकर सो जाना, जब तुम्हारी नींद खुलेगी तब तुम स्वयं को देशनोक में पाओगे और फिर बाद में ऐसा ही हुआ। (वर्तमान में देशनोक स्थित श्री करणी  माता के मंदिर में वही मूर्ति स्थापित है, जिसे बन्ना खाती ने श्री करणी माता के आदेश पर बनाया था )

After this Shri Karni Mata reached Jaisalmer and saw Shri Temdaraya, where the Maharawal of Jaisalmer welcomed Shri Karni Mata. During her stay in Jaisalmer, Shri Karni Mata reached the house of her devotee Banna Khati and asked him to make her idol. Then Banna Khati said that I am blind from birth, how can I make your idol. Then Shri Karni Mata looked into Banna Kati's eyes, which made him see everything. After this, Shri Karani Mata showed Banna Khati the form for which the idol was to be made, and ordered to make the idol and to be sent to Deshnok. Then Banna Khati requested that Deshnok is far away, how will I reach there with the idol. Then Shri Karni Mata said that after the completion of the idol, you put it under your head and go to sleep, when your sleep will open then you will find yourself in Deshnok and then same happened. (Presently the same idol is installed in the temple of Shri Karani Mata in Deshnok, which was created by Banna Khati on the order of Shri Karani Mata). 

 

इसके बाद श्री करणी माता खारोडा पहुंची और अपनी बहनों से मुलाकात की, खारोडा से श्री करणी माता ने देशनोक की ओर रवाना हुई, जहाँ मार्ग में गाडियाला और गिरछर के बीच धनेरू की तलाई के पास उन्होंने पड़ाव डाल  लिया। अगले दिन सूर्योदय के समय श्री करणी माता ने स्नान करने की इच्छा प्रकट की और अपने पुत्र पुण्यराज को पास के तालाब से पानी लाने के लिए भेज दिया। पुण्यराज को दूर भेजकर श्री करणी माता ने एक पत्थरों की चौकी बनाई और उस पर स्नान करने के लिए बैठ गयी, और रथवान विशनोई से कहा की रथ में एक मटकी रखी है जिसमें कुछ पानी है, उस मटकी को ले आओ और उसका पानी मुझ पर उंडेल दो। जैसे ही रथवान ने श्री करणी माता के ऊपर पानी डाला तो उनके शरीर से एक ज्वाला निकली और उसी पल श्री करणी माता का भौतिक शरीर उस ज्वाला में अद्रश्य हो गया। 

After this Sri Karni Mata reached Kharoda and met her sisters, then Sri Karani Mata proceeded towards Deshnok, Where on the route she made a stop in Dhaneru Talai between Gadiala and Girchar. The next day, at Sunrise Sri Karni Mata expressed her desire to bathe and sent her son Punyaraja to fetch water from a nearby pond. After sending Punyaraja away, Shri Karni Mata made a small stone post and sat down to bathe on it, and said to Rathwan Vishanoi that there is a pot in the chariot which has some water, bring that pot and pour its water on me . As soon as Rathwan poured water on Shri Karni Mata, a flame came out of her body and at that moment Shri Karni's physical body became disappeared in that flame.

 

जब पुण्यराज पानी लेकर वापस आये तब रथवान विशनोई ने उन्हें सारी घटना सुनाई। उसी समय (आकाशवाणी हुई) और दोनों को श्री करणी माता की आवाज सुनाई दी, की मैंने इतने समय के लिए ही इस भौतिक शरीर को धारण किया था, अब तुम लोग यहाँ से देशनोक पहुँचो, आज से ठीक चौथे दिन मेरा भक्त बन्ना खाती देशनोक में मेरे गुम्भारे के बहार सोता हुआ मिलेगा उसके सिर के नीचे मेरी मूर्ति होगी, उस मूर्ति को मेरे गुम्भारे में स्थापित कर देना। अब से मैं उस मूर्ति में निवास करुँगी और जो मुझे सच्चे दिल से पुकारेगा मैं उसकी प्रार्थना अवश्य सुनूंगी। 

When Punyaraja came back with water, Rathwan Vishanoi told him the whole incident. At the same time, both of them heard the voice of Shri Karni Mata, that I had worn this physical body for so long, now you people reach Deshnok from here. From today on the fourth day, my devotee Bannakhati will be found sleeping outside my place in Deshnok,  Under his head will be my idol, install that idol in my place. I will reside in that idol, and I will surely hear the prayer of someone who calls me from the depth of heart. 

 

 उसके बाद सभी लोग देशनोक पहुंचे, ठीक चौथे दिन बन्ना खाती देशनोक में श्री करनी माता के गुम्भारे के बहार सोता हुआ पाया गया, जिसके सिर के निचे करणी माता की मूर्ति थी। सभी भक्तो ने मिलकर उस मूर्ति को स्थापित किया और गुम्भारे के स्थान पर एक मंदिर बना दिया और उस मंदिर में श्री करणी माता की मूर्ति की पूजा की जाने लगी, जो उस समय से लेकर आज तक निरंतर जारी है। 

After that everyone reached Deshnok, on the fourth day Banna khati was found sleeping in Deshnok outside the place of Shri Karni Mata with a statue of Karni Mata under his head. All the devotees jointly installed the idol and built a temple in place of Sri karni mata idol. The idol of Shri Karni Mata began to be worshiped in that temple, which has continued continuously from that time till today.

 

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