Wednesday, September 9, 2020

श्री करणी माता मन्दिर, Sri Karni Mata Temple in Hindi

  Sri Karni Mata Temple / श्री करणी माता मन्दिर

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Karni Mata Mandir

श्री करणी माता मंदिर भारत में एक प्रसिद्ध हिंदु मन्दिर है, यह भारत के राजस्थान राज्य के बिकानेर जिले के देशनोक गांव में स्थित है। इस मंदिर में श्री करणी माता की पूजा की जाती है, श्री करणी माता का जन्म 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था, श्री करणी माता के बचपन नाम रिधुबाई था। श्री करणी माता के आशीर्वाद से ही जोधपुर और बीकानेर राज्यों की स्थापना हुई थी। बीकानेर राजघराने के लोग श्री करणी माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजतें हैं। श्री करणी माता ने अपने जीवनकाल में कई चमत्कारिक घटनाएं की, जिनके कारण उन्हें दुर्गा देवी का अवतार माना जाने लगा। श्री करणी माता ने अपने 151 वर्ष लम्बे जीवनकाल के बाद 1538 स्वयं को योग अग्नि के द्वारा भस्म कर लिया था। जिसके बाद उनके भक्त उनका एक  मंदिर बनाकर उनकी पूजा करने लगे, जो की उस समय से लेकर आज तक निरंतर जारी है। 

 

श्री करणी माता मंदिर में बीस हजार से अधिक चूहे रहतें हैं, ये चूहे मंदिर में हर जगह घुमते रहतें हैं, मंदिर में चूहों की संख्या इतनी अधिक है की मंदिर में श्रद्धालुओं को अपने पैर घसीटते हुए चलना पड़ता है, जिससे की कोई चूहा पैर के नीचे कुचला न जाये। श्री करणी माता मंदिर में चूहों को काबा कहा जाता है तथा यह सभी चूहे श्री करणी माता की संतान माने जातें हैं। 


श्री करणी मातामंदिर की विशेस्ताएं Specialties of Shri Karni Mata Temple in Hindi

श्री करणी माता मंदिर में हर साल लाखों की संख्या में भक्त करणी माता के दर्शन करने आते है। नवरात्रों के दौरान इस मन्दिर में भक्तो की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है। इस मंदिर में भक्त श्री करणी माता से सुख और समृद्धि कामना करते है। इस मंदिर में हजारों चूहों के साथ कुछ सफ़ेद चूहे भी रहतें हैं, ऐसा माना जाता है की इस मंदिर में सफ़ेद चूहा दिखाई देने पर मनोकामना पूर्ण हो जाती है। 


श्री करणी माता मंदिर में कुछ चमत्कार प्रत्यक्ष देखे जा सकते है, जैसे की मंदिर में इतनी अधिक मात्रा में चूहे होने के बावजूद मंदिर में चूहों की कोई गंध नहीं आती, इसके अलावा मंदिर के पांच सौ साल के इतिहास में चूहों के कारण कभी कोई बीमारी नहीं फैली जबकि मंदिर में प्रतिदिन चूहों के खाये हुए प्रसाद का वितरण किया जाता है। यहाँ तक की भारत में जब प्लेग बीमारी फैली थी, उस समय भी यह मंदिर और पूरा देशनोक क़स्बा प्लेग से पूरी तरह से सुरक्षित था। मंदिर में इतनी अधिक संख्या में चूहे होने बावजूद कभी कोई चूहा मंदिर परिसर के बहार नहीं देखा जाता।  

 

श्री करणी माता मंदिर में रहने वाले चूहों में ऐसी कई विशेस्ताएं पायी जाती हैं जो सामान्य चूहों नहीं पायी जाती जैसे :- 

मंदिर के सभी चूहे एक ही आकर के हैं

श्री करणी माता मंदिर के सभी चूहे एक ही आकार के दिखाई देते है उनमें कहीं कोई छोटा चूहा या बड़े आकर का मोटा चूहा दिखाई नहीं देता। मंदिर में चूहों को हर प्रकार का उच्च कोटि का पौस्टिक भोजन बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध रहता है, लेकिन इसके बावजूद चूहे मोटे नहीं होते और सभी चूहे एक ही आकर के पाए जाते है। जबकि सामान्य चूहे बहुत अधिक भोजन मिलने पर मोटे और आकर में बड़े हो जातें हैं। 


मंदिर के चूहों के दाँत ज्यादा लम्बे नहीं बढ़ते 

इस मंदिर के चूहे किसी भी चीज को दांतो से नहीं कुतरते हैं, इसके बावजूद इन चूहों के दांत सामान्य लम्बाई के ही रहतें हैं, जबकि सामान्य चूहों के दाँत बहुत तेजी से बढ़ते है, और उनके दांत एक साल में एक से दो इंच तक बढ़ कर जबड़ों को चीर सकते है। इसलिए सामान्य चूहे किसी भी चीज को दांतो से कुतर कर अपने दांतो की लम्बाई सामान्य बनाये रखते है। 


मंदिर के चूहे विचित्र अनुशासन का पालन करते है 

इस मंदिर के चूहों में एक अनुशासन पाया जाता है, गर्भगृह में रहने वाले चूहे गर्भगृह से बहार नहीं जाते, इसी प्रकार मंदिर के बरामदे में रहने वाले चूहे गर्भगृह में नहीं आते, श्री करणी माता मंदिर परिसर में बने अन्य छोटे मंदिरो में रहने वाले चूहे वहां से किसी अन्य जगह पर नहीं जाते, गलियारे में रहने वाले चूहे गलियारे से बहार नहीं जाते। इस प्रकार एक विचित्र अनुशासन यहां के चूहों में पाया जाता है जो अन्य स्थानों पर पाए जाने वाले सामान्य चूहों  में देखने को नहीं मिलता। 


श्री करणी माता मंदिर में हजारों चूहे रहतें है परन्तु इस मंदिर में चूहों की कोई गंध नहीं आती है, यहां तक की मृत चूहों की भी कोई गंध मंदिर में नहीं आती, जो की आश्चर्यजनक है। 

 

श्री करणी माता की संक्षिप्त जीवनी Brief biography of Shri Karni Mata in Hindi

श्री करणी माता के पिता का नाम मेहाजी किनिया था, तथा माता का नाम देवल देवी था। मेहाजी कीनिया की पांच पुत्रियां थी परन्तु उनके एक भी पुत्र नहीं था। पुत्र प्राप्ति के लिए मेहाजी किनिया ने वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में स्थित श्री हिंगलाज माता मंदिर की कठिन यात्रा की। मेहाजी किनिया के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर श्री हिंगलाज माता ने उनको दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा तब मेहाजी कीनिया ने कहा की मैं चाहता हूँ की मेरा नाम हमेशा चलता रहे और भविष्य में भी लोग मुझे जाने। श्री हिंगलाज माता ने कहा ऐसा ही होगा और यह कहकर वह अन्तर्धान हो गयी। 

 

उसके बाद मेहाजी की पत्नी देवल देवी को गर्भ रहा और इस बार मेहाजी को पुत्र प्राप्ति की पूरी आशा थी, परन्तु उनकी पत्नी को 21 माह की आश्चर्यजनक रूप से लम्बी गर्भवस्था के बाद 20 सितम्बर 1387 ई को एक कन्या  की प्राप्ति हुई। इस कन्या का मुँह चौड़ा, रंग गहरा और शरीर स्थूल था, कन्या का नाम रिघुबाई रखा गया, रिघुबाई एक चमत्कारिक कन्या थी, उन्होंने समय समय पर कई चमत्कार दिखाकर अपनी दैवीय शक्ति का प्रदर्शन किया। जिसके कारण उन्हें दुर्गा देवी का अवतार करणी माता कहा जाने लगा। 

 

श्री करणीजी का विवाह साठिका गांव में केलूजी बिठू के पुत्र देपाजी के साथ तय किया गया।  1416 में 29 वर्ष की आयु में श्री करणीजी का विवाह देपाजी बिठू के साथ किया गया, परन्तु देपाजी श्री करणीजी के रूप के कारण इस विवाह से खुश नहीं थे। विवाह के बाद मेहाजी कीनिया ने बारात को तीन-चार दिन तक अपने यहां रखकर वर-वधु को विदाई दी और वर-वधु बारात साथ साठिका गांव के लिए रवाना हुए। 

 

 मार्ग में श्री करणीजी ने देपाजी को देवी दुर्गा के रूप में दर्शन दिए और कहा की मैं आपकी सहधर्मिणी अवश्य हूँ, लेकिन मेरा यह जन्म दीन-दुखियो की सेवा और उनकी रक्षा करने के लिए हुआ हैं। मेरा पिछले जन्म में अत्यंत सुन्दर रूप था जिसके कारण मुझे अपने कर्त्तव्य पूर्ति में बहुत सारी बाधाएं आयी थी, इसलिए इस जन्म में मैंने यह विरुप भौतिक शरीर धारण किया है ताकि इस जन्म में उन बाधाओं की पुनरावृति न हो। इसलिए आप मुझसे गृहस्त संबंध नहीं रख सकते, अतः आप अपनी गृहस्ती चलाने के लिए मेरी छोटी बहन गुलाबबाई से विवाह कर लेना, वह आपकी गृहस्ती को बहुत अच्छे से संभाल लेगी। ऐसा कहकर श्री करणीजी पुनः अपने मानव रूप में आ गयी, देपाजी को यह सब भ्रम के समान प्रतीत हुआ और वे बारात के साथ मार्ग में आगे बढ़ गए। 

 

कुछ दिन की यात्रा के बाद बारात साठिका गांव पहुंच गयी। देपाजी के पिता इस विवाह से अत्यंत प्रसन्न थे क्योकि श्री करणीजी के रूप में स्वयं देवी दुर्गा उनके घर में पुत्रवधु के रूप में पधारी थी। कुछ दिन बाद श्री करणीजी ने देपाजी से फिर से कहा की आप गृहस्ती चलाने के लिए मेरी छोटी बहन गुलाबबाई से शादी कर लो। यह सुनकर देपाजी को मार्ग में देवी दुर्गा की कही बात याद आ गयी। देपाजी श्री करणीजी के साथ विवाह करके खुश नहीं थे इसलिए उन्होंने सहर्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, क्योकि उन्होंने गुलाबबाई को देख रखा था वह बहुत सुन्दर थी। इस प्रकार श्री करणीजी की सहमती से देपाजी और गुलाबबाई का विवाह तय हो गया। 1417 में देपाजी और गुलाबबाई विवाह संपन्न हुआ।

 

इसके बाद श्री करणीजी जनकल्याण के कार्यों में लग गयी और उन्होंने अपने 151 वर्ष लम्बे जीवनकाल में अनगिनत चमत्कार दिखाए और लोगों का कल्याण किया, जिनके कारण उनकी ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गयी। और लोग उन्हें करणी माता कहकर बुलाने लगे। साधारण जनमानस के अलावा उस समय के कई राजपूत राजा और सरदार श्री करणी माता के अन्नय भक्त थे जिनमें से कुछ प्रमुख नाम इस प्रकार है :- जैसलमेर के रावल : चाचगदेव, रावल देवीदास, रावल घड़सी और महारावल जैतसी, मारवाड़ के शासक: राव चूंडा, राव रिड़मल, राव जोधा (जोधपुर राज्य के संस्थापक) और राव बीका (बीकानेर राज्य के संस्थापक), राव बिका के पुत्र राव लूणकरण, राव लूणकरण के पुत्र राव जैतसी, पूंगल के शासक: शेखा भाटी,  आदि नाम प्रमुख हैं। 

 

एक दिन श्री करणी माता ने अपने परिवार से सभी सदस्यों को बुलाकर कहा की मुझे इस भौतिक शरीर को धारण किये हुए 150 वर्ष हो चुके है इसलिए अब मैं इस भौतिक शरीर को छोड़ना चाहती हूँ। इसलिए अब मैं यहाँ से जैसलमेर जाकर श्री तेमड़ाराय के दर्शन करूंगी, उसके बाद अपनी बहनों से मिलने खारोडा (वर्तमान में सिंध, पाकिस्तान) जाउंगी, और वहाँ से वापस आते समय रास्ते में मैं अपना भौतिक शरीर छोड़ दूंगी। यह सुनकर परिवार के सभी सदस्य दुखी हो गए और श्री करणी माता के साथ चलने की प्रार्थना करने लगे, लेकिन श्री करणी माता ने उन्हें अपने साथ चलने से मना कर दिया।  परिवार के अन्य सदस्य तो मान गए परन्तु उनके सबसे बड़े पुत्र पुण्यराज ने साथ में चलने का हट किया। तब श्री करणी माता ने कहा की मेरे ज्योतिर्लिन होने की घटना को देखना तुम्हारे भाग्य में नहीं लिखा है और तुम्हारी आयु 117 वर्ष हो चुकी है, इसलिए तुम्हे मेरे साथ चलने की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन पुण्यराज नहीं माने, जिसके बाद श्री करणी माता ने उन्हें अपने साथ चलने की अनुमति दे दी। इस यात्रा में में श्री करणी माता के साथ उनके पुत्र पुण्यराज, रथवान सरंगिया विशनोई, और एक सेवक थे।


इसके बाद श्री करणी माता ने जैसलमेर पहुंचकर श्री तेमड़ाराय के दर्शन किये, वहाँ पर जैसलमेर के महारावल ने श्री करणी माता का स्वागत किया। जैसलमेर प्रवास के दौरान श्री करणी माता अपने भक्त बन्ना खाती के घर पहुंची और उसे अपनी मूर्ति बनाने के लिए कहा। तब बन्ना खाती ने कहा की मैं जन्म से अँधा हूँ मैं आपकी मूर्ति कैसे बना सकता हूँ। तब श्री करणी माता ने बन्ना खाती की आँखों में देखा, जिससे उसे सबकुछ दिखाई देने लगा। इसके बाद श्री करणी माता ने बन्ना खाती को वह रूप दिखाया जिसकी मूर्ति बनायीं जानी थी, और मूर्ति बनाकर देशनोक पहुंचाने का आदेश दिया। तब बन्ना खाती ने निवेदन किया की देशनोक बहुत दूर है मैं मूर्ति लेकर वहां कैसे पहुँचूँगा। तब श्री करणी माता ने कहा मूर्ति पूरी होने के बाद तुम उसे अपने सिर के नीचे रखकर सो जाना, जब तुम्हारी नींद खुलेगी तब तुम स्वयं को देशनोक में पाओगे और फिर बाद में ऐसा ही हुआ। (वर्तमान में देशनोक स्थित श्री करणी  माता के मंदिर में वही मूर्ति स्थापित है, जिसे बन्ना खाती ने श्री करणी माता के आदेश पर बनाया था )

 

इसके बाद श्री करणी माता खारोडा पहुंची और अपनी बहनों से मुलाकात की, खारोडा से श्री करणी माता ने देशनोक की ओर रवाना हुई, जहाँ मार्ग में गाडियाला और गिरछर के बीच धनेरू की तलाई के पास उन्होंने पड़ाव डाल  लिया। अगले दिन सूर्योदय के समय श्री करणी माता ने स्नान करने की इच्छा प्रकट की और अपने पुत्र पुण्यराज को पास के तालाब से पानी लाने के लिए भेज दिया। पुण्यराज को दूर भेजकर श्री करणी माता ने एक पत्थरों की चौकी बनाई और उस पर स्नान करने के लिए बैठ गयी, और रथवान विशनोई से कहा की रथ में एक मटकी रखी है जिसमें कुछ पानी है, उस मटकी को ले आओ और उसका पानी मुझ पर उंडेल दो। जैसे ही रथवान ने श्री करणी माता के ऊपर पानी डाला तो उनके शरीर से एक ज्वाला निकली और उसी पल श्री करणी माता का भौतिक शरीर उस ज्वाला में अद्रश्य हो गया।

 

जब पुण्यराज पानी लेकर वापस आये तब रथवान विशनोई ने उन्हें सारी घटना सुनाई। उसी समय (आकाशवाणी हुई) और दोनों को श्री करणी माता की आवाज सुनाई दी, की मैंने इतने समय के लिए ही इस भौतिक शरीर को धारण किया था, अब तुम लोग यहाँ से देशनोक पहुँचो, आज से ठीक चौथे दिन मेरा भक्त बन्ना खाती देशनोक में मेरे गुम्भारे के बहार सोता हुआ मिलेगा उसके सिर के नीचे मेरी मूर्ति होगी, उस मूर्ति को मेरे गुम्भारे में स्थापित कर देना। अब से मैं उस मूर्ति में निवास करुँगी और जो मुझे सच्चे दिल से पुकारेगा मैं उसकी प्रार्थना अवश्य सुनूंगी।

 

 उसके बाद सभी लोग देशनोक पहुंचे, ठीक चौथे दिन बन्ना खाती देशनोक में श्री करनी माता के गुम्भारे के बहार सोता हुआ पाया गया, जिसके सिर के निचे करणी माता की मूर्ति थी। सभी भक्तो ने मिलकर उस मूर्ति को स्थापित किया और गुम्भारे के स्थान पर एक मंदिर बना दिया और उस मंदिर में श्री करणी माता की मूर्ति की पूजा की जाने लगी, जो उस समय से लेकर आज तक निरंतर जारी है। 


 

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