Tuesday, October 20, 2020

Kailash Temple, Ellora कैलाश मंदिर, एलोरा

कैलाश मंदिर, एलोरा Kailasa Temple, Ellora in Hindi

कैलाश मंदिर, एलोरा . Kailash Temple, Ellora

भारत में महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद शहर में एक अनोखा और अत्यंत प्राचीन कैलाश मंदिर स्थित है, यह मंदिर एक पुरे पहाड़ को काटकर बनाया गया है। यह दोमंजिला मंदिर भगवान् शिव को समर्पित है। यह मंदिर भारत में चट्टान को काटकर बनाया गया सबसे बड़ा मंदिर है। ऐसा माना जाता है की इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्णदेव प्रथम ने 8 वीं शताब्दी में करवाया था, परन्तु इस विषय में पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है, इसलिए वास्तव में इस मंदिर को कब बनाया गया था, इस विषय में कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। कैलाश मंदिर एलोरा की गुफाओं का एक हिस्सा है। यूनेस्को द्वारा 1983 में कैलाश मंदिर और एलोरा - अजंता की गुफाओं को विश्व धरोहर घोषित किया गया था। मुग़ल सुल्तान औरंगजेब ने कैलाश मंदिर को तोड़ने के लिए अपने शासन कल के दौरान 1000 सैनिक भेजे, वे सैनिक 3 साल तक इस मंदिर को तोड़ते रहे, परन्तु वे इस मंदिर को पूरी तरह नस्ट नहीं कर सके, लेकिन उन सैनिकों ने इस मंदिर की कलाकृतियों और मूर्तियों को भारी नुक्सान पहुंचाया। 

 

कैलाश मंदिर एलोरा गुफाओं का हिस्सा है। एलोरा में कुल 34 गुफाएं है, ये गुफाएं हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म को समर्पित है। एलोरा की गुफाओं में 1 से 12 तक बौद्ध धर्म को समर्पित है, 13 से 29 तक हिन्दू धर्म को समर्पित है और 30 से 34 तक जैन धर्म को समर्पित है। कैलाश मंदिर गुफा संख्या 16 में स्थित है, इस मंदिर की लम्बाई 276 फ़ीट, चौड़ाई 154 फ़ीट है और ऊंचाई 90 फ़ीट है, कैलाश मंदिर इस सभी 34 गुफाओं में से सबसे बड़ा और भव्य निर्माण है। कैलाश मंदिर को छोड़कर बाकि सभी गुफाओं का निर्माण सातवीं और आठवीं शताब्दी में  है। एलोरा की सभी 34 गुफाएं 2 किलोमीटर से अधिक लम्बे क्षेत्र में फैले है। एलोरा गुफाओं के निकट ही एलोरा गांव है, इसी गांव के नाम पर ही इन गुफाओं को एलोरा गुफाएं कहा जाता है।  


अद्भुत तकनीक द्वारा निर्मित मंदिर 

कैलाश मंदिर को जिस तरह से बनाया गया है उसे देखकर आश्चर्य होता है। क्योकिं इस मंदिर को जिस  तकनीक से बनाया गया है वह तकनीक आज के आधुनिक युग में भी उपलब्ध नहीं है। कैलाश मंदिर को एक पुरे पहाड़ को काटकर ऊपर से नीचे की ओर एक मूर्ति की तरह बनाया गया है, इस मंदिर में सबसे पहले इसके शिखर का निर्माण किया गया, उसके बाद क्रमशः निचे की ओर बढ़ते हुए मंदिर के कक्ष और सीढ़ियों का निर्माण किया गया। ईमारत बनाने की इस तकनीक में ईमारत में लगे हुए मौजूदा पत्थरो से सैकड़ो गुना अधिक पत्थर काटकर निकले जाते है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है की, इस मंदिर का एक कक्ष बनाने के लिए उस पुरे कक्ष को पत्थर काट कर खोखला किया जाता है,  और इस प्रक्रिया में इतना अधिक पत्थर काट कर निकाला जाता है जो उस कक्ष में लगे हुए पत्थरों से कहीं ज्यादा होता है। 

 

पत्थर काटने की यह तकनीक आज के युग में भी वैज्ञानिको को आश्चर्यचकित कर देती है, क्योकिं एक पुरे पहाड़ को खोखला करके किसी भवन का निर्माण करना आज की आधुनिक मशीनों के द्वारा भी संभव नहीं है, फिर हजारों साल पहले इस मंदिर का निर्माण कैसे किया गया यह आज भी रहस्य बना हुआ है। मंदिर में बने केवल एक स्तम्भ का निर्माण करने के लिए हजारों टन पत्थरों को काटकर निकला गया था और इस पुरे मंदिर को बनाने के लिए 4 लाख टन से अधिक पत्थरों को काट निकला गया था। 

 

कैलाश मंदिर को दो मंजिलों में बनाया गया है, इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर गोपुरम बना हुआ है, इस मंदिर का एक अतिभव्य शिखर बनाया गया है, मंदिर परिसर में ही दो विशाल स्तंभ बनाए गए है। मंदिर में कई कक्ष बने है, जिनको आपस में जोड़ने के लिए पुल बनाये गए है। इस मंदिर में पानी के निकास और पानी को संग्रह करने की भी व्यवस्था की गयी है। हर कक्ष में आने जाने के लिए सीढियाँ बनी है। पुरे मंदिर में अंदर और बाहर के पत्थरों में मूर्तियां उकेरी गयी है और नक्काशी की गयी है। यह सभी मूर्तियां और नक्काशी इतनी बारीकी से बनाई गयी है, की देखने में अतिसुन्दर और जिवंत प्रतीत होती है। 


आज के युग में किसी भी जटिल ईमारत का निर्माण करने के पहले उस ईमारत का कंप्यूटर में नक्शा बनाया जाता है उसके बाद ही ईमारत बनाने का काम शुरू किया जाता है। इसलिए कैलाश मंदिर  में इतनी बारीकी किया गया काम बिना किसी पूर्व तैयारी और बिना नक़्शे के नहीं किया जा सकता। उस समय इस मंदिर को बनाने जिस तकनीक का प्रयोग किया गया था, उस तकनीक की आज के युग में केवल कल्पना ही की जा सकती है, क्योकि किसी भी ईमारत का नक्शा उस ईमारत की नक्काशियों के साथ बनाना अत्यंत कठिन कार्य है, और जब उस ईमारत को किसी पहाड़ को काटकर और खोखला करके बनाया जाये और ईमारत बनाने के साथ-साथ उस पर बारीक़ नक्काशी भी की जाये, और यह सब काम अत्यंत कठोर पत्थर पर किया जाये तो इस कार्य में प्रयोग की जाने वाली तकनीक अत्यंत ही जटिल हो जाती है। इस प्रकार के निर्माण कार्य में यदि पत्थर के एक भी हिस्से को तराशने में कोई गलती हो जाती तो पुरे मंदिर की योजना (फार्मेशन ) गलत हो जाती है। इस प्रकार इतना जटिल निर्माण कार्य करने के आवश्यक तकनीक आज के युग में भी उपलब्ध नहीं है। 

 

कैलाश मंदिर का वास्तुशिल्प 

 कैलाश मंदिर को पहाड़ के ढलान के साथ साथ बनाया गया है, इस मंदिर का आधार लगभग 84 मीटर लम्बा और 47 मीटर चौड़ा है। मंदिर में प्रवेश करते ही मंदिर का गोपुरम बना है जिसकी उचाई मंदिर के शिखर से बहुत कम है। मंदिर में प्रवेश द्वार की बाएं ओर उकेरी गयी मूर्तियां भगवान शिव से सम्बंधित देवताओं की है और दायीं और उकेरी गयी मूर्तियां भगवान् विष्णु से सम्बंधित देवताओं की है। 

 

मुख्य द्वार के अंदर गजलक्ष्मी की मूर्ति उकेरी गयी है, तथा मुख्य मंडप को सहारा देने के लिए 16 खम्बे बनाये गए है, जिन पर सुन्दर नक्काशी की गयी है। मुख्य मंडप और नंदी के मंडप को एक पुल से जोड़ा गया है। गोपुरम से अंदर चलने पर एक खुला परिसर है, जिसमे दोनों तरफ दो विशाल हाथियों की मूर्तियां उकेरी गयी हैं, उनके आगे दोनों ओर दो विशाल स्तम्भ बने हुए है, जिनकी उचाई 45 फ़ीट है, उन पर बहुत सुन्दर नक्काशी की गयी है। परिसर में मुख्य मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। पूरा मंदिर परिसर दो मंजिलों में बना हुआ है। इस मंदिर का निर्माण बहुत ही बारीकी से किया गया है। पुरे मंदिर परिसर में अनगिनत मूर्तियां उकेरी गयी है, जो देखने में जिवंत प्रतीत होती है। इन मूर्तियों में विभिन्न देवी देवताओं और रामायण और महाभारत के दृश्य उकेरे गए है


 

कैलाश मंदिर के रहस्य

कैलाश मंदिर का निर्माण किस तकनीक के द्वारा किया गया यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है, परन्तु हिन्दू ग्रंथो में एक प्राचीन उपकरण का वर्णन मिलता है, जिसे भोमास्त्र कहा जाता था। यह उपकरण चट्टानों को काटने और भवन निर्माण में प्रयोग होता था। इस उपकरण के द्वारा बहुत ही कम समय में चट्टानों को कटा जा सकता था, और इस उपकरण के द्वारा काटी गयी चट्टानें तुरंत भाप बन कर उड़ जाती थी और भवनों का निर्माण बहुत ही शीघ्रता  से हो जाता था। माना जाता है की कैलाश मंदिर का निर्माण इसी भोमास्त्र के द्वारा किया गया था। 

 

कैलाश मंदिर को बनाने के लिए 4 लाख टन अधिक चट्टानों को काट कर निकला गया था, ऐसी चट्टानें किसी  काम की नहीं होती और सामान्यतः ऐसी चट्टानों को आस पास ही इकठ्ठा किया जाता है।  परन्तु कैलाश मंदिर के आसपास और दूर-दूर तक के क्षेत्रों में भी चट्टानों मलबा दिखाई नहीं देता। इतनी बड़ी मात्रा में निकला गया चट्टानों मलबा कहाँ गया यह एक रहस्य है। 

 

कैलाश मंदिर के नीचे सुरंगो का जाल बिछा है, इन सुरंगो में प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है। सामान्य व्यक्तियों के अलावा शोधकर्ता भी इस सुरंगो में नहीं जा सकते। ऐसा माना जाता है की ये सुरंगे एक भूमिगत शहर की ओर जाती है। यह सुरंगे और यह शहर आज भी एक रहस्य बने हुए है। 


 इनके अलावा कैलाश मंदिर निर्माण कब और किसके द्वारा किया गया यह भी एक रहस्य बना हुआ है। 

 

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