Thursday, December 31, 2020

श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का महत्त्व, बनावट और अन्य जानकारी

श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का महत्त्व, बनावट और अन्य जानकारी 

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श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर

श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का महत्त्व 

श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के परम पवित्र 12 ज्योतिर्लिंगों में से चौथा ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर भारत के मध्यप्रदेश राज्य के खंडवा जिले में नर्मदा नदी मध्य स्थित मान्धाता नाम के टापू पर स्थित है। इस टापू को शिव पूरी भी कहा जाता है। यह टापू लगभग 4 किलोमीटर लम्बा और 2 किलोमीटर चौड़ा है। इस टापू का आकर देवनागरी के ॐ अक्षर के समान है। श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग से कुछ दुरी पर नर्मदा नदी के उस पर श्री ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। इन दोनों ज्योतिर्लिंग को एक ही ज्योतिर्लिंग माना जाता है। श्री ओम्कारेश्वर में भक्तगण अपनी कामनापूर्ति के लिए नर्मदा नदी का जल लेकर श्री ओम्कारेश्वर और मान्धाता पर्वत की परिक्रमा करते है, यह कुल 7 किलोमीटर लम्बी परिक्रमा होती है, इस परिक्रमा पथ में कई अन्य मंदिर भी आतें है, जहाँ यात्रा के दौरान दर्शन किये जाते है। 


श्री ओम्कारेश्वर मंदिर में प्रत्येक सोमवार को पुजारियों और भक्तों के द्वारा श्री ओम्कारेश्वर भगवान की स्वर्ण मूर्ति को सुन्दर पालकी में विराजित करके ढोल-नगाड़ों के साथ एक भव्य जुलुस निकला जाता है। इस जुलुस को सोमवार सवारी के नाम से जाना जाता है। इस जुलुस में सर्वप्रथम नर्मदा नदी के तट पर जाकर पूजन किया जाता है, उसके बाद श्री ओम्कारेश्वर भगवान को पुरे नगर में भ्रमण कराया जाता है। पवित्र सावन मास के दौरान इस जुलुस की भव्यता देखते ही बनती है, इस दौरान बहुत बड़ी संख्या में भक्त भगवान भोलेनाथ के जयकारों का उद्घोष करते हुए, गुलाल उड़ाते हुए और नृत्य करते हुए इस जुलुस में चलते है।    


श्री केदारनाथ मंदिर और श्री ओम्कारेश्वर मंदिर का संबंध 

सर्दियों में जब श्री केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद हो जाते है, तब भगवान श्री केदारनाथ की पालकी को श्री ओम्कारेश्वर मंदिर लाया जाता है। उसके बाद अगले 6 महीनों तक श्री केदारनाथ और पंचकेदार शिवलिंगो की पूजा श्री ओम्कारेश्वर मंदिर में की जाती है। श्री केदारनाथ मंदिर के कपाट पुनः खुलने की तिथि भी यहीं पर निर्धारित की जाती है। ग्रीष्मकाल में श्री केदारनाथ मंदिर और पंचकेदार मंदिरों के कपाट खुलने के बाद भी उनके सवरूपों की पूजा यहां निरंतर जारी रहती है। इस प्रकार श्री ओम्कारेश्वर मंदिर में पुरे सालभर श्री केदारनाथ और पंचकेदारों के दर्शन किये जा सकते है, और इनके दर्शन से उतना ही पुण्यफल मिलता है, जितना श्री केदारनाथ मंदिर और पंचकेदार मंदिरों के अलग-अलग दर्शन से मिलता है।    


श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की पौराणिक कहानी 

शिव पुराण की कथा के अनुसार सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उनसे इच्छित वरदान माँगने को कहा। राजा ने अपनी प्रजा के कल्याण और मोक्ष प्राप्ति के लिए भगवान शिव से वहीं निवास करने का वरदान माँगा, जिसके बाद भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में उसी स्थान पर निवास करने लगे। तभी से इस तीर्थ स्थल को ओंकार-मान्धाता के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है की श्री ओम्कारेश्वर और मान्धाता की परिक्रमा करने से धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार विंध्याचल पर्वत ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने विंध्याचल पर्वत को मनवांछित वरदान प्रदान किये। उसी समय कुछ देवता और ऋषिगण वह पर आ गए और उनकी प्रार्थना पर भगवान शिव ने श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग का एक हिस्सा अलग किया और ममलेश्वर शिवलिंग का निर्माण किया। श्री ममलेश्वर लिंग श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग से कुछ दुरी पर स्थित है, दोनों ज्योतिर्लिंगों के मंदिर अलग-अलग होते हुए भी दोनों का स्वरुप एक ही माना जाता है। 


श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की बनावट

श्री ओम्कारेश्वर मंदिर का निर्माण कब किया गया यह अज्ञात है, क्योकि हजारों साल से इस मंदिर में भक्त दर्शन करने आ रहें हैं, परन्तु इस मंदिर के निर्माण के विषय में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह मंदिर नर्मदा नदी के मध्य में स्थित मान्धाता नाम के टापू पर स्थित है, नर्मदा नदी को पार करके यहां पहुंचने के लिए पुल बने हुए हैं, यहाँ पर नाव द्वारा भी पंहुचा जा सकता है। नर्मदा नदी के किनारे स्थित बस्ती को विष्णुपुरी कहा जाता है। नर्मदा नदी को पार करके भक्त मान्धाता द्वीप के घाट पर पहुंचते है, घाट के निकट कोटितीर्थ स्थित है, इसे चक्रतीर्थ भी कहा जाता है। यहीं पर स्नान करके भक्त सीढियाँ चढ़कर श्री ओम्कारेश्वर मंदिर पहुंचते है, जो नदी तल से कुछ ही उचाई पर स्थित है। 


श्री ओम्कारेश्वर मंदिर पांच मंजिलों में बना हुआ है, सबसे निचली मंजिल पर श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है, ज्योतिर्लिंग का आकर अनघढ़ है, पास में ही देवी पार्वती की मूर्ति स्थित है, श्री ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के शिखर के ठीक निचे स्थित नहीं है, यह एक ओर हटकर स्थित है, ज्योतिर्लिंग के सामने नंदी की मूर्ति स्थित है, नंदी की मूर्ति के मुख के निचे हनुस्तंब बना हुआ है, जो आम तौर पर नंदी की मूर्तियों में देखने को नहीं मिलता है , प्रथम मंजिल के प्रांगण में ही पंचमुखी गणेश जी मूर्ति भी स्थापित है। दूसरी मंजिल पर श्री महाकालेश्वर लिंग स्थापित है, यह शिखर के ठीक नीचे स्थित है, यहां भी प्रांगण में नंदी की मूर्ति स्थापित है । तीसरी मंजिल पर श्री सिद्धनाथ लिंग स्थित है, यह भी शिखर के ठीक नीचे स्थित है। चौथी मंजिल पर श्री गुप्तेश्वर लिंग स्थित है तथा पांचवी मंजिल पर श्री ध्वजेश्वर लिंग स्थित है। पूरा मंदिर उत्तरभारतीय  वास्तुशैली में बनाया गया है। 


नर्मदा नदी का महत्त्व 

नर्मदा नदी भारत की पांचवी सबसे बड़ी नदी है, यह नदी पूरी तरह भारत में बहती है। नर्मदा नदी को रेवा और मेकल कन्या के नाम से भी जाना जाता है। यह नदी पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है, यह नदी मध्यप्रदेश के अमरकंटक से शुरू होकर गुजरात के भरुच नगर के निकट खम्बात की खाड़ी में गिरती है। 


नर्मदा नदी की गिनती गंगा, यमुना, कावेरी और गोदावरी के साथ पांच सबसे पवित्र नदियों में की जाती है, इनमें से किसी भी नदी में स्नान करने से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। नर्मदा नदी को गंगा नदी से भी अधिक प्राचीन माना जाता है। नर्मदा नदी के माहात्म्य के बारे में पुराणों में लिखा है की एक समय गंगा नदी करोड़ों लोगो के स्नान के कारण स्वयं प्रदूषित हो गयी थी, अतः स्वयं की शुद्धि के लिए देवी गंगा एक काली गाय का रूप लेकर नर्मदा नदी के पवित्र जल में स्नान करने आयी थी। इसके अलावा नर्मदा नदी एक मात्र नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। नर्मदा नदी की परिक्रमा किसी भी तीर्थयात्रा में सबसे कठिन यात्रा मानी जाती है। इस यात्रा लिए भक्त गुजरात के भरुच से पदयात्रा प्रारंभ करते हैं और नदी के साथ चलते हुए मध्यप्रदेश के अमरकंटक में नदी के उदगम स्थान तक जाते है, उसके बाद फिर दूसरी दिशा से वापस गुजरात के भरुच तक जातें है। यह कुल 2600 किलोमीटर लम्बी पदयात्रा होती है।  


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