Saturday, December 26, 2020

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर, उज्जैन | Shri Mahakaleshwar Jyotirling Ujjain in Hindi

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर, उज्जैन 

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श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उज्जैन

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्त्व 

श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। यह मंदिर भारत के मध्यप्रदेश राज्य की प्राचीन नगरी उज्जैन में स्थित है। यह ज्योतिर्लिंग स्वयंभू और अत्यंत जाग्रत माना जाता है। श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की गिनती भगवान शिव के परम पवित्र 12 ज्योतिर्लिंगों में की जाती है। बारह ज्योतिर्लिंगों में भी श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का एक विशेष स्थान है, क्योंकि यह दुनिया का एक मात्र मंदिर है, जहाँ दक्षिण मुखी शिवलिंग स्थापित है। श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के विषय में ग्रंथो में लिखा है की, आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से बढ़कर अन्य कोई ज्योतिर्लिंग नहीं है। श्री महाकालेश्वर को कालों का भी काल कहा जाता है, इसलिए श्री महाकालेश्वर के दर्शन करने से अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।  


हिन्दू धर्म के सभी त्यौहार सबसे पहले श्री महाकालेश्वर मंदिर में ही मनाये जाते है, भगवान शिव का त्यौहार शिवरात्रि तो यहाँ नौ दिन पहले ही शुरू हो जाता है, जिसे यहाँ पर शिव-नवरात्रि कहा जाता है।शिव-नवरात्रि के दौरान प्रत्येक दिन श्री महाकालेश्वर का अलग-अलग श्रंगार किया जाता और शिवरात्रि के दिन श्री महाकालेश्वर का दूल्हे के सामान श्रंगार किया जाता है। इस दिन देश-विदेश से हजारों भक्त श्री महाकालेश्वर के दर्शन करने आते है। सावन महीने के प्रत्येक सोमवार को राजाधिराज श्री महाकालेश्वर की सवारी निकलती है, इस दिन श्री महाकालेश्वर नगर भ्रमण के लिए निकलते है, जैसे ही पालकी मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर पहुँचती है, तब सशस्त्र पुलिस बल श्री महाकालेश्वर को सलामी देता है। इस यात्रा को देखने के लिए हजारों भक्त इखट्टा होते है और यात्रा का आनंद लेते है।  


श्री महाकालेश्वर को उज्जैन का महाराजा माना जाता है 

सम्राट विक्रमादित्य के समय से ही श्री महाकालेश्वर को उज्जैन के महाराजा माना जाता है। प्राचीन समय से ही यह परंपरा रही है, की किसी राजा के राज्य में जब कोई दूसरा राजा आता था तो उसे रात के समय नगर की सिमा के बहार ठहराया जाता था, क्योकि यह माना जाता था की एक राज्य में दो राजा एक साथ नहीं ठहर सकते। श्री महाकालेश्वर उज्जैन के महाराजा है, इसलिए प्राचीन समय से ही कोई भी राजा उज्जैन नगरी में रात को नहीं रुकते थे, यह माना जाता है की यदि कोई राजा रात के समय उज्जैन नगरी में ठहरता है, तो उसे परिणाम भुगतना पड़ता है। इसलिए आज भी यह परंपरा चली आ रही है, और कोई भी मुख्य मंत्री और उच्च अधिकारी रात को उज्जैन नगरी में नहीं ठहरते। 


यह मान्यता आज के समय में भी सत्य प्रतीत होती है, क्योकि ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलते है जो इस मान्यता को सही ठहराते हैं जैसे :- मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई श्री महाकालेश्वर के दर्शन करने के बाद रात को उज्जैन नगरी में ही ठहर गए थे और अगले ही दिन उनकी सरकार गिर गयी थी। मुख्यमंत्री वाई एस येदयुरप्पा रात को उज्जैन नगरी में ठहर गए थे, और अगले 20 दिनों में ही उन्हें अपने पद स्तीफा देना पड़ा था। उज्जैन में किसी मुख्यमंत्री को रुकना न पड़े इसलिए उज्जैन का सर्किट हाउस भी शहर की सिमा से बहार बना हुआ है। सिंधिया परिवार ने भी अपने रुकने के लिए उज्जैन की सिमा से बहार गेस्ट हाउस बनवा रखा है। 


उज्जैन नगरी का महत्त्व 

उज्जैन शिप्रा नदी के दाहिने तट पर स्थित एक अत्यंत प्राचीन नगरी है, उज्जैन हमेशा से एक धार्मिक और पवित्र नगरी के रूप में प्रसिद्ध रहा है। इस नगरी का वर्णन पुराणों में भी मिलता है। श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की नगरी होने के कारण उज्जैन नगरी को एक अत्यंत विशेष स्थान प्राप्त है। उज्जैन को अवान्तिका नगर के नाम से भी जाना जाता है, इसकी गिनती मोक्ष प्रदान करने वाली सप्त पुरियों में की जाती है। राजा भर्तहरि की योगस्थली और महर्षि सांदिपनी की तपोस्थली भी यही नगर रहा है। यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने महर्षि सांदिपनी के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी। यह नगरी सम्राट विक्रमादित्य के साम्राज्य की राजधानी थी। प्राचीन समय में यह नगरी अत्यंत वैभवशाली थी, इस नगरी में महलों भरमार हुआ करती थी, सभी महलों के निर्माण में स्वर्ण का अत्यधिक उपयोग किया जाता था, विशेषकर महलों के शिखर और सभी दरवाजे शुद्ध स्वर्ण के प्लेटों से सजाये जाते थे, इसलिए उज्जैन नगरी को कनकसरिंगा भी कहा जाता था। महाकवि बाणभट्ट, कालिदास आदि महान कवियों की कर्मस्थली भी यही नगर रहा है। 


श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का वास्तुशिल्प 

श्री महाकालेश्वर मंदिर तीन मंजिलों का है, इसके सबसे निचली मंजिल पर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है, मध्य मंजिल पर श्री ओंकारेश्वर लिंग स्थित है तथा ऊपरी मंजिल पर श्री नागचन्द्रेश्वर लिंग स्थित है। श्री नागचन्द्रेश्वर लिंग के दर्शन केवल नाग पंचमी के पर्व को ही मिलते है। मंदिर परिसर में एक बड़े आकर का कुंड स्थित है जिसका नाम कोटितीर्थ है, यह कुंड सर्वातोभद्र शैली में बनाया गया है। यह कुंड और इस कुंड का पानी अत्यंत दिव्य  माना जाता है। कुंड के पूर्व में एक विशाल बरामदा है, जिसमे से होकर गर्भगृह के प्रवेश द्वार तक पंहुचा जा सकता है। बरामदे के उत्तरी भाग में एक कक्ष बना हुआ है, जिसमे भगवान श्री राम और देवी अवान्तिका की पूजा की जाती है। मंदिर परिसर के दक्षिणी भाग में कई छोटे बड़े मंदिर है, ये मंदिर शिंदे शासनकाल बनाये गए थे। इन मंदिरो में वृद्ध महाकालेश्वर, अनादि कल्पस्वारा और सप्तऋषियों के मंदिर प्रमुख है, ये सभी मंदिर शिल्पकला के अद्भुत नमूने है। 


मंदिर के गर्भगृह में श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है, आकर में यह ज्योतिर्लिंग बहुत विशाल है। गर्भगृह में ही देवी पार्वती, भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की मूर्तियां भी स्थित है। गर्भगृह की सभी दीवारें और छत चांदी की प्लेटों के आवरण से ढकी गयी है, जिनके ऊपर भगवान शिव की स्तुतियाँ दर्शाई गयी है। ज्योतिर्लिंग के समीप ही दो विशाल दीपक स्थित है, जो हमेशा प्रज्वलित रहते है। गर्भगृह के द्वार के ठीक सामने धातु से बनी नंदी प्रतिमा स्थित है, जिसका मुख शिवलिंग की ओर है। श्री महाकालेश्वर मंदिर की वास्तुकला में मराठा, भूमिजा, और चालुक्य वास्तुशिल्प शैलियों का असर देखने को मिलता है। मंदिर के शिखर को शुद्ध स्वर्ण की प्लेटों से ढंका गया है।  


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