Monday, January 4, 2021

श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का महत्त्व, पौराणिक कहानी, वास्तुशिल्प और अन्य जानकारी

बाबा वैद्यनाथ मंदिर का महत्त्व, पौराणिक कहानी, वास्तुशिल्प और अन्य जानकारी

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बाबा वैद्यनाथ मंदिर, देवघर, झारखण्ड 

श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का महत्त्व 

श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है, यह मंदिर भारत के झारखण्ड राज्य के देवघर जिले में स्थित है, देवघर का अर्थ होता है "देवताओं का घर"। श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर की गिनती भगवान शिव के परम पवित्र द्वादश ज्योतिर्लिंगों में की जाती है, इस मंदिर में आने वाले भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूरी हो जाती है, इसलिए इस ज्योतिर्लिंग को कामना लिंग भी कहा जाता है, इसके अलावा श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को बाबा वैद्यनाथ भी कहा जाता है। श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर में श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग मंदिर की तरह ही देवी सती का शक्तिपीठ भी स्थित है, यहीं पर देवी सती का ह्रदय गिरा था, इसलिए इस मंदिर की गिनती देवी सती के परम पवित्र 51 शक्तिपीठों में भी की जाती है, इस स्थान पर देवी सती का शक्तिपीठ, ज्योतिर्लिंग की स्थापना से पहले से ही उपस्थित है। इस स्थान पर देवी सती का ह्रदय गिरा था, इसलिए इस शक्तिपीठ को हृदयपीठ और हार्दपीठ भी कहा जाता है। इस मंदिर में विराजित शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग के महत्त्व का वर्णन पद्मपुराण के पातालखण्ड में भी किया गया है। इस  मंदिर में शिव और शक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, इसलिए शास्त्रों के अनुसार यहाँ सच्चे मन से पूजा करने से हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है और व्यक्ति जीवन के सभी सुखों को प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। 


इस मंदिर में हर साल लाखों लोग भगवान शिव के दर्शन करने आते है, श्रावण महीने के दौरान यह सांख्या कई गुना बढ़ जाती है । श्रावण के महीने में इस मंदिर में मेले का आयोजन किया जाता है। पूरे श्रावण महीने के दौरान भक्त वैद्यनाथ से 108 किलोमीटर दूर सुल्तानगंज से गंगा नदी का जल कलश में भरकर लातें है और श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक करतें हैं, इस दौरान जलाभिषेक करने के लिए पुरे 108 किलोमीटर तक भगवा कपड़ों में भक्तों की अटूट लाइन लगी रहती है। 


श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर की कहानी 

एक बार राक्षसराज रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर जाकर कठोर तपस्या की, और अपने सिर को काट-काट कर शिवलिंग पर चढ़ाने लगा। इस प्रकार एक एक करके उसने अपने दस सिर भगवान शिव को समर्पित कर दिए, जब वह अपना दसवां सिर भी काटने ही वाला था, उसी समय भगवान शिव उसके सामने प्रकट हो गए और उन्होंने रावण  सभी सिर लौटा दिए और उससे मनवांछित वरदान माँगने को कहा। रावण के पास सबकुछ था, उसके पास वैभवशाली सोने की लंका थी, तीनों लोकों को जीतने की शक्ति थी, उसने यक्ष, गन्धर्व और कई देवताओं को बंदी बना रखा था। इसलिए उसने अपनी शक्ति और वैभव को और भी अधिक बढ़ाने के लिए भगवान शिव से लंका में निवास करने की प्रार्थना की। 


भगवान शिव ने प्रसन्न होकर रावण को कामना लिंग प्रदान किया और उससे कहा की जहाँ भी तुम इस कामना लिंग को एक बार स्थापित कर दोगे मै वहीं निवास करूँगा, और एक बार स्थापित हो जाने के बाद फिर इस लिंग को अपने स्थान से नहीं हटाया जा सकेगा। रावण ने भगवान शिव की शर्त मान ली और कामना लिंग को लेकर चल पड़ा। यह देख सभी देवता अत्यंत चिंतित हो गए क्योकि यदि रावण ने कामना लिंग को लंका में स्थापित कर दिया, तो रावण हर तरह से अजेय हो जायेगा और फिर उससे युद्ध में जीतना असंभव हो जायेगा। सभी देवता इस समस्या के समाधान के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे। तब भगवान विष्णु ने लीला रची और जब रावण हिमालय से लंका के मार्ग में देवघर के पास पंहुचा तब रावण को प्रबल लघुशंका लगी। रावण शिवलिंग को साथ में लेकर लघुशंका नहीं कर सकता था और शिवलिंग को धरती पर भी नहीं रख सकता था, इसलिए रावण ने कामना लिंग को एक बैजू नाम के ग्वाले को पकड़ा दिया और स्वयं लघुशंका करने चला गया। उस ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु ही थे इसलिए उन्होंने कामना लिंग उसी स्थान पर रख दिया और अंतर्ध्यान हो गए। 


जब रावण लघुशंका करके वापस लौटा तो उसने देखा की कामना लिंग धरती पर रखा हुआ है, रावण ने उसे उठाने की बहुत कोशिश की परन्तु वह उस शिवलिंग को अपने स्थान से नहीं हिला सका। तब उसे भगवान शिव की कही बात याद आई और वह क्रोधित होकर शिवलिंग पर अपना अंगूठा गड़ाकर लंका को चला गया। उसके बाद ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवताओं ने वहाँ आकर कामना लिंग की पूजा की और उसकी स्थापना करके लौट गए। उसी समय से भगवान शिव कामना लिंग के रूप में देवघर की भूमि पर निवास करते है। 


ऐसे पड़ा वैद्यनाथ नाम 

शिवपुराण के अनुसार जिस-जिस स्थान पर देवी सती के शरीर के हिस्से गिरे थे, उन सभी स्थानों पर उनकी रक्षा के लिए भगवान शिव ने भैरव स्थापित किये थे। देवघर में देवी सती का ह्रदय गिरा था, देवी के ह्रदय की रक्षा के लिए भगवान शिव ने देवघर में वैद्यनाथ नाम के भैरव की स्थापना की थी। इसलिए जब रावण कामना लिंग लेकर देवघर पहुंचा, तब भगवान ब्रह्मा और विष्णु ने कामना लिंग का नाम वहाँ स्थापित भैरव के नाम पर वैद्यनाथ रख दिया।   


एक अन्य मान्यता के अनुसार रावण ने बैजू नाम के ग्वाले को कामना लिंग थमाया था, और उसी ग्वाले ने कामना लिंग को जमीन पर रखकर इसे स्थापित किया था, इसलिए उस ग्वाले के नाम पर इस शिवलिंग को वैद्यनाथ कहा जाता है।  


श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर का वास्तुशिल्प 

श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर एक विशाल परिसर में स्थित है, इस परिसर में श्री वैधनाथ मंदिर, श्री शक्तिपीठ मंदिर और विभिन्न देवताओं के मंदिरों समेत कुल 22 मंदिर स्थित है। यह पूरा परिसर पत्थर की दिवारों से घिरा हुआ है। श्री वैधनाथ मंदिर की उचाई लगभग 72 फुट है, इस मंदिर का मुख पूर्व की ओर है। श्री वैद्यनाथ मंदिर और  शक्तिपीठ मंदिर को आपस में गठबंधन से जोड़ा गया है। श्री वैद्यनाथ मंदिर के गर्भगृह में श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग स्थित है, ज्योतिर्लिंग का शीर्ष भाग थोड़ा क्षतिग्रस्त है। मंदिर के निकट ही शिवगंगा नाम की झील स्थित है। परिसर में स्थित सभी मंदिर पगोडा वास्तुशैली में बनाये गए है।  


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