Friday, January 8, 2021

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की जानकारी

 श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की जानकारी  

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श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महत्त्व 

श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। यह मंदिर महाराष्ट्र राज्य में पुणे से 125 किलोमीटर दूर भोरगिरि गांव में सहयाद्रि पर्वत पर स्थित है। यहीं से भीमा नदी निकलती है, जो आगे चलकर कृष्णा नदी में मिल जाती है। श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की गिनती भगवान शिव के परम पवित्र द्वादश ज्योतिर्लिंगों में की जाती है, श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग आकार में बहुत बड़ा और मोटा है, इसलिए इस मंदिर को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी पुकारा जाता है। श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से 7 जन्मों के पाप नस्ट हो जाते है, और व्यक्ति के लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते है। 


श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग विवाद 

असम के लोग महाराष्ट्र में स्थित श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पर सवाल उठाते है, असम के लोगो के अनुसार असली भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र में नहीं बल्कि असम में गुहावटी के निकट पमोही गांव में स्थित डाकिनी पर्वत के ऊपर स्थित है। असम के लोगो का यह दावा सत्य प्रतीत होता है, क्योकि भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों की अधिकृत जानकारी के लिए शिवपुराण का आश्रय लिया जाता है। शिवपुराण में श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के प्रादुर्भाव की कथा का वर्णन है, जिसके अनुसार यह ज्योतिर्लिंग कामरूप राज्य के पर्वतों के मध्य स्थापित है, और असम का ही पुराना नाम कामरूप है। असम में स्थापित इस ज्योतिर्लिंग के आसपास का क्षेत्र ठीक वैसा ही है जैसा की शिवपुराण में वर्णन मिलता है। श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के महाराष्ट्र में होने का शिवपुराण में कहीं कोई वर्णन नहीं मिलता। 


असम के लोगो का मानना है की श्री शंकरदेव जी की वैष्णव भक्ति की आंधी के कारण यहां शिवभक्ति का वेग कम हो गया, जिसके कारण श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पिछली कुछ सदियों से गुमनामी के अंधेरों में खो गए। यहां स्थित श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की सेवा में जो पुजारीजन है वे जनजातीय लोग है, और सैकड़ों वर्षों से श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की पूजा-अर्चना निष्ठा से चुपचाप करते आ रहें है। यहां पर काशी और पुरे देशभर से संत और भक्तजन आकर साधना और पूजा-अर्चना करते है। 


श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की कहानी   

शिव पुराण में श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की कथा का वर्णन किया गया है, जिसके अनुसार त्रेता युग में भीम नाम का एक महाबलशाली राक्षस था, वह लंका के राजा रावण के छोटे भाई कुम्भकरण का पुत्र था, वह कामरूप प्रदेश में अपनी माता कर्कटी के साथ रहता था। भीम ने अपने पिता को कभी नहीं देखा था क्योकि उसके जन्म से ठीक पहले उसके पिता कुम्भकरण का भगवान श्री राम के हाथो वध हो गया था। जब राक्षस भीम युवावस्था को प्राप्त हुआ, तब उसकी माता कर्कटी ने उसे भगवान विष्णु के अवतार श्री राम के हाथों उसके पिता कुम्भकरण के वध की बात बताई। यह सुनकर भीम अत्यंत क्रोधित हो उठा और भगवान विष्णु का वध करने का उपाय सोचने लगा। उसने शक्ति प्राप्त करने के लिए 1000 वर्ष तक ब्रम्हाजी की कठिन तपस्या की, उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रम्हाजी ने उसे लोक विजयी होने का वरदान दे दिया। 


ब्रम्हाजी से वरदान प्राप्त करने के बाद राक्षस भीम अत्यंत शक्तिशाली हो गया, अपनी शक्ति के मद में चूर होकर वह सभी को प्रताड़ित करने लगा, उसने पूरी पृथ्वी पर अधिकार जमा लिया उसके बाद उसने देवलोक पर आक्रमण करके देवताओं को भी अपने अधीन कर लिया और देवलोक को भी अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद उसने भगवान विष्णु को भी युद्ध में पराजित कर दिया। अब उस निरंकुश राक्षस ने सभी तरह के पूजा पाठ बंद करवा दिए। उस राक्षस के अत्याचारों से परेशान होकर सभी ऋषिगण भगवान शिव की शरण गए, ऋषियों की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने उन्हें आस्वाशन दिया की वे शीघ्र ही उस राक्षस का निवारण करेंगे। 


कामरूप क्षेत्र के राजा सुदक्षिण भगवान शिव के परम भक्त थे, उन्होंने राक्षसराज भीम के मना करने के बाद भी भगवान शिव की पूजा करना जारी रखा, इसलिए उस राक्षस ने राजा सुदक्षिण को बंदी बनाकर कारागार में डलवा दिया। राजा सुदक्षिण ने कारागार में मिटटी का शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा करना जारी रखा। इससे क्रोधित होकर राक्षसराज भीम ने कारागार में बने मिटटी के शिवलिंग को तोड़ने के लिए अपनी तलवार से प्रहार किया। तलवार शिवलिंग से छू पाती इससे पहले ही भगवान शिव कारागार में प्रकट हो गए और उन्होंने राक्षसराज भीम को अपनी क्रोधाग्नि से भस्म कर दिया। यह देखकर सभी देवतागण वहां पर उपस्थित हो गए और भगवान शिव की स्तुति करने लगे। इसके बाद देवताओं ने सभी के कल्याण के लिए भगवान शिव से ज्योतिर्लिंग के रूप में उसी स्थान पर निवास करने  प्रार्थना की। भगवान शिव सबकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए उस स्थान  ज्योतिर्लिंग के रूप में निवास करने लगे। 


भगवान शिव ने उस स्थान पर राक्षसराज भीम का वध किया था, इसलिए यह ज्योतिर्लिंग श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुआ।    

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