Tuesday, January 12, 2021

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्त्व, कहानी और अन्य जानकारी

 श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का महत्त्व, कहानी और अन्य  जानकारी

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श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का  महत्त्व 

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है, इस ज्योतिर्लिंग की गिनती भगवान शिव के परम पावन द्वादश ज्योतिर्लिंगों में की जाती है। यह ज्योतिर्लिंग स्वयंभू माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के दारुकवन  क्षेत्र में स्थित है। नागेश्वर का अर्थ होता है "नागों के ईश्वर", यह ज्योतिर्लिंग सभी प्रकार से विष से सुरक्षा का प्रतिक है। शास्त्रों में इस ज्योतिर्लिंग की बड़ी महिमा का वर्णन किया गया है, जिसके अनुसार जो व्यक्ति भक्तिभाव से श्रद्धा पूर्वक श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति की कथा और इसका माहात्म्य सुनेगा उसे समस्त पापों से मुक्ति मिल जाएगी, और वह समस्त सुखों का भोग करता हुआ अंत में मोक्ष प्राप्त कर भगवान शिव के लोक तो प्राप्त होगा। 


श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा 

शास्त्रों में श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा का वर्णन किया गया है, जिसके अनुसार प्राचीन समय में भगवान शिव का भक्त था जिसका नाम सुप्रिय था, वह एक बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी व्यापारी था। वह भगवान शिव की बड़े ही भक्ति भाव से पूजा करता और हमेशा उनके ही ध्यान में तल्लीन रहता था। सुप्रिय की शिव भक्ति से दारुक नाम का एक राक्षस बहुत क्रोधित रहता था, वह नहीं चाहता था की सुप्रिय भगवान शिव की भक्ति करे। इसलिए वह हमेशा सुप्रिय की पूजा अर्चना में विघ्न पहुंचने की कोशिश करता रहता था। 


एक दिन सुप्रिय अपने कुछ साथियों के साथ समुद्री मार्ग से नाव पर सवार होकर कहीं जा रहा था। उसी समय राक्षस दारुक ने उन पर आक्रमण कर दिया, और सभी यात्रियों को बंदी बना कर कारागार में डाल दिया। लेकिन इससे सुप्रिय की शिव भक्ति पर कोई असर नहीं पड़ा और उसने कारागार में भी भगवान शिव की भक्ति करना जारी रखा। सुप्रिय की शिव भक्ति से प्रभावित होकर कारागार में सभी लोग भगवान शिव की भक्ति करने लगे। जिससे पूरा कारागार शिव भक्ति के भजनों और मंत्रों से गूंजने लगा। जब इसकी खबर राक्षस को मिली तो वह अत्यंत क्रोधित हो गया, और तुरंत कारागार में व्यापारी सुप्रिय के पास पहुंचा। सुप्रिय उस समय भगवान शिव के ध्यान में मग्न था। सुप्रिय को ध्यानमग्न देख राक्षस उस पर क्रोध में चिल्लाने लगा, लेकिन उसके चिल्लाने पर भी जब सुप्रिय की ध्यान समाधी भंग नहीं हुई तो राक्षस क्रोध से पागल हो उठा, और उसने अपने सैनिकों को सुप्रिय और उसके साथियों को मार डालने के आदेश दे दिया। व्यापारी सुप्रिय राक्षस के इस आदेश से जरा भी भयभीत नहीं हुआ और वह अपनी और अपने साथियों की रक्षा के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करने लगा। उसकी प्रार्थना सुनकर भगवान शिव तत्काल ज्योतिर्लिंग के रूप में उस स्थान पर प्रकट हो गए और उन्होंने सुप्रिय को अपना पाशुपतास्त्र प्रदान किया। इस अस्त्र की सहायता से व्यापारी सुप्रिय ने राक्षस दारुक और उसके सैनिकों का वध कर दिया। इसके बाद भगवान् शिव के आदेश पर उस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर रखा गया। 


श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग विवाद 

 भगवान शिव के 64 प्रमुख ज्योतिर्लिंग माने जाते है, उनमें से भी 12 ज्योतिर्लिंगों को विशेष महत्त्व प्राप्त है, जिन्हे द्वादश ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से दो ज्योतिर्लिंगों की भौगोलिक स्थिति को लेकर लोगो के अलग अलग मत है। इनमे से एक है श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग दूसरा है श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग। 


श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य के दारुकवन नाम के क्षेत्र में स्थित है, इसके अलावा महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में स्थित श्री औंधा नागनाथ ज्योतिर्लिंग और उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित श्री जागेश्वर ज्योतिर्लिंग को भी श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग माना जाता है। 


श्री जागेश्वर ज्योतिर्लिंग, अल्मोड़ा, उत्तराखंड 

श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के विषय में शास्त्रों में लिखा गया है "दारुकवने नागेशं" अर्ताथ नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दारुकवन में स्थित है। दारुकवन का अर्थ देवदार के जंगलों से लिया जाता है। देवदार के वृक्ष हिमालय के पश्चिमी क्षेत्रों में बहुतायत में पाए जाते है जहाँ अल्मोड़ा के जागेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है। जबकि गुजरात में जो नागेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है उस क्षेत्र में देवदार के वृक्ष नहीं पाए जाते, इसके अलावा द्वारका के निकट जिस स्थान पर श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है वहां कोई जंगल भी स्थित नहीं है। हो सकता है दारुकवन का नाम द्वारकावन के नाम से फैला हो जिसके कारण द्वारका के निकट स्थित ज्योतिर्लिंग को नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। 


अल्मोड़ा में स्थित श्री जागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का निर्माण सातवीं सताब्दी में किया गया था। यहां पर स्थित ज्योतिर्लिंग स्वयंभू है और अर्धनारेश्वर के रूप है, ज्योतिर्लिंग के बड़े भाग में भगवान शिव है और छोटे भाग में माता पार्वती है। यहां पर कुल 124 मंदिर स्थित है जिनमे से पांच प्रमुख मंदिर है। 


श्री औंधा नागनाथ ज्योतिर्लिंग, हिंगोली महाराष्ट्र 

श्री औंधा नागनाथ ज्योतिर्लिंग को भी श्री नागेश्वर ज्योतिर्लिंग माना जाता है। श्री औंधा नागनाथ ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में स्थित औंधा नागनाथ गांव में स्थित है, यह मंदिर साठ हजार वर्गफुट से अधिक क्षेत्रफल वाले परिसर में स्थित है। मंदिर परिसर में ही भगवान गणेश, भगवान विष्णु, नीलकण्ठेश्वर महादेव, भगवान दत्तात्रेय, महर्षि वेदव्यास, पाण्डवों और दशावतार के कुल 12 छोटे मंदिर भी बने हुए है। यह मंदिर सात मंजिलों में बना है। मंदिर में अद्भुद शिल्पकला देखने को मिलती है। मंदिर की पत्थरों से बनी दीवारों पर हिन्दू देवी देवताओं की अनगिनत मूर्तियां उकेरी गई है। मुख्य गर्भगृह एक संकरी गुफा के अंदर बना हुआ है। अन्य हिन्दू मंदिरों से अलग यह मंदिर पश्चिम मुखी है और इस मंदिर में नंदी की मूर्ति मंदिर के पीछे स्थित है, जिसकी वजह भगवान शिव का एक अध्बुध चमत्कार है जिसकी कथा इस प्रकर है :-


एक बार संत नामदेव इस मंदिर में पूजा करने आये थे। संत नामदेव छोटी जाती से सम्बन्ध रखते थे इसलिए मंदिर के पुजारियों ने उन्हें मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया, इसलिए संत नामदेव मंदिर के पीछे बैठकर भगवान शिव की आराधना करने लगे। उसी समय भगवान शिव ने अध्बुध चमत्कार दिखाया और पूरा मंदिर संत नामदेव की ओर घूम गया। इस प्रकार यह मंदिर जो पहले पूर्व मुखी था अब पश्चिम मुखी हो गया। यह चमत्कार देखकर मंदिर के सभी पुजारी संत नामदेव के चरणों में गिर गए और अपने किये अपराध की क्षमा मांगी। 

पहले इस मंदिर को नागनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता था। भगवान शिव के चमत्कार के कारण यह मंदिर उलटी दिशा में घूम गया था, इसलिए इस मंदिर को औंधा नागनाथ के नाम से पुकारा जाने लगा। 


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