चारधाम मंदिरों की विस्तृत जानकारी Chardham in Hindi - GYAN OR JANKARI

Latest

Thursday, July 1, 2021

चारधाम मंदिरों की विस्तृत जानकारी Chardham in Hindi

चारधाम मंदिरों की विस्तृत जानकारी


चारधाम मंदिरों का संक्षिप्त परिचय 

चारधाम मंदिरों की गिनती हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में की जाती है, इनके नाम श्री बद्रीनाथ मंदिर, श्री रामेश्वरम मंदिर, श्री जगन्नाथपुरी मंदिर और श्री द्वारकापुरी मंदिर है। ये चार मंदिर भारत देश की चारो दिशाओँ पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में स्थापित है, ये सभी मंदिर मुखतः भगवान विष्णु और भगवान शिव  समर्पित है, इन चार मंदिरों को सम्मिलित रूप से चारधाम कहा जाता है। बहुत से लोग उत्तराखंड में स्थित गंगोत्री, जमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा को ही चारधाम यात्रा मानते है, परन्तु इस यात्रा में केवल एक ही धाम श्री बद्रीनाथ के ही दर्शन हो पाते है, इसलिए इस यात्रा को छोटा चारधाम यात्रा कहा जाता है। 

Chardham-Mandir, Chardham-Temple, Chardham-Yatra, Chardham-Mandir-ki-Jankari, Chardham-Temple-detailed-information
चारधाम मंदिरों की जानकारी 

चारधाम का महत्त्व  

हिन्दू धर्म में चारधाम यात्रा का विशेष महत्त्व है, ऐसा माना जाता है की चारधामों की यात्रा करने से मनुष्य अपने सभी पापों से मुक्त होकर जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है, इसलिए प्रत्येक हिन्दू अपने जीवन में एक बार चारधाम की यात्रा अवश्य करना चाहता है। 


प्राचीन समय में चारधाम यात्रा को अत्यंत ही कठिन माना जाता था क्योकिं चारधाम भारत के चार कोनों पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण में स्थित है, जो एक दूसरे से हजारों किलोमीटर की दुरी पर स्थित हैं, यातायात  साधनों का आभाव होने के कारण उस समय यह यात्रा पैदल या बैलगाड़ी के द्वारा ही की जाती थी, जिसमे कई वर्षों का समय लग जाता था तथा कई यात्री मार्ग की कठिनाइयों के कारण इस यात्रा को पूर्ण भी नहीं कर पाते थे और मार्ग में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे, इसलिए उस समय अधिकतर लोग अपनी सभी जिम्मेदारियों को पूर्ण करके जीवन के अंतिम पड़ाव में इस यात्रा पर निकलते थे। इतनी लम्बी दुरी की यात्रा के मार्ग में हजारों मठ और मंदिर भी पड़ते थे, यात्री उन सभी स्थानों पर दर्शन और प्रार्थना करते हुए जाते थे जिसके कारण उस समय चारधाम यात्रा का महत्त्व कई गुणा बढ़ जाता था, परन्तु आज यातायात की सुगमता होने के कारण कुछ ही दिनों या हफ्तों में चारधाम की यात्रा की जा सकती है, जिसके कारण आजकल बहुत अधिक लोग चारधाम की यात्रा करने लगे है।


चारधाम मंदिरों की विशेषताएं 

श्री बद्रीनाथ मंदिर 

श्री बद्रीनाथ मंदिर को प्रथम धाम माना जाता है, यह मंदिर उत्तराखंड राज्य में, भारत के उत्तरी हिस्से में स्थित है, इस मंदिर की स्थापना सतयुग में की गयी थी तथा इस मंदिर में मुख्यतः भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है प्राचीन समय में यह स्थान भगवान शिव का था, भगवान विष्णु ने तपस्या करने के लिए यह स्थान भगवान शिव से प्राप्त किया था, इस जगह पर भगवान विष्णु ने बहुत लम्बे समय तक तपस्या की थी, तपस्या के दौरान देवी लक्ष्मी ने बद्रिवृक्ष (बेर का वृक्ष) का रूप धारण करके प्रचंड हिमपात और अत्यधिक ठण्ड से भगवान विष्णु की रक्षा की थी, जिसके कारण इस स्थान को बद्रीनाथ कहा जाने लगा। इसी स्थान पर भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ने भी तपस्या की थी, श्री बद्रीनाथ मंदिर से लगभग 41 किलोमीटर की दुरी पर भगवान शिव का श्री केदारनाथ मंदिर स्थित है, क्योकि भगवान विष्णु ने यह स्थान भगवान शिव से प्राप्त किया था, इसलिए श्री बद्रीनाथ की यात्रा से पहले श्री केदारनाथ की यात्रा की जाती है, अन्यथा श्री बद्रीनाथ की यात्रा को निष्फल माना जाता है। 


श्री बद्रीनाथ मंदिर की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें 


श्री रामेश्वरम मंदिर

श्री रामेश्वरम मंदिर को दूसरा धाम माना जाता है, यह मंदिर तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरम जिले में, भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित है, जिस स्थान पर यह मंदिर स्थित है उस स्थान पर त्रेता युग में भगवान श्री राम ने शिवलिंग की स्थापना करके भगवान शिव की पूजा की थी। इस मंदिर को श्री रामानाथस्वामी मंदिर भी कहा जाता है, यह मंदिर समुद्र में एक शंख के आकर के द्वीप पर स्थित है, यहीं से कुछ दुरी पर ही भगवान् श्री राम द्वारा बनाया गया श्री राम सेतु भी स्थित है जो श्रीलंका तक जाता है।  इस मंदिर में मुख्यतः भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है, इस मंदिर की गिनती भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में भी की जाती है। 


श्री रामेश्वरम मंदिर की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें 


श्री द्वारकाधीश मंदिर 

श्री द्वारकापुरी को तीसरा धाम माना जाता है, इसकी गिनती सप्तपुरियों में भी की जाती है, इस मंदिर की स्थापना द्वापर युग में की गयी थी, यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। यह मंदिर भारत के पश्चिमी छोर पर, गुजरात राज्य के द्वारका नगर में अरब सागर और गोमती नदी के संगम पर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने श्री कृष्ण के निवास के ऊपर करवाया था। 


श्री द्वारकाधीश मंदिर की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें 


श्री जगन्नाथपुरी मंदिर 

श्री जगन्नाथपुरी मंदिर को चौथा धाम माना जाता है, यह मंदिर ओडिशा राज्य के पुरी शहर में, भारत के पूर्वी तट पर स्थित है, इस मंदिर की स्थापना कलयुग में की गयी थी, यह मंदिर भगवान श्री कृष्ण के स्वरूप श्री जगन्नाथ भगवान को समर्पित है। इस मंदिर के मुख्य देवता भगवान श्री जगन्नाथ, उनके बड़े भाई श्री बलभद्र और छोटी बहन श्री सुभद्रा हैं। इस मंदिर में इन तीनों देवताओ की काष्ठ (लकड़ी) से बनी मूर्तिओं की पूजा की जाती है, तथा इन लकड़ी से बनी मूर्तियों को हर बारह साल में बदला जाता है, और नयी मूर्तियाँ स्थापित की जाती है। 


भगवान श्री जगन्नाथ की मूर्ति में एक दिव्य पदार्थ स्थित रहता है, जिसे नयी मूर्ति बदलने के दौरान पुरानी मूर्ति में से निकाल कर नयी मूर्ति में स्थापित किया जाता है, हर बारह साल में मूर्ति तो बदल जाती है, परन्तु वह दिव्य पदार्थ हजारों सालों से इसी प्रकार पुरानी मूर्ति से नयी मूर्ति में स्थापित किया जाता आ रहा है। ऐसा कहा जाता है की वह दिव्य पदार्थ भगवान श्री कृष्ण का वास्तिवक हृदय है, परन्तु उस दिव्य पदार्थ को आज तक किसी ने भी नहीं देखा क्योकिं नयी मूर्ति में दिव्य पदार्थ स्थापित करने की प्रक्रिया का निर्वाह अत्यंत गोपनीय तरीके से किया जाता है।  


श्री जगन्नाथपुरी मंदिर में प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की शुक्लपक्ष की द्वितीय तिथि को विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस रथ यात्रा के लिए भगवान श्री जगन्नाथ, उनके बड़े भाई श्री बलभद्र और छोटी बहन श्री सुभद्रा के लिए अलग-अलग तीन भव्य और विशाल रथों का निर्माण किया जाता है जो पूरी तरह से लकड़ी के बनाये जाते है। रथयात्रा में श्रद्धालु रथों को रस्सों से खींच कर ले जाते है, इस रथ यात्रा में लाखों श्रद्धालु भाग लेते है। ऐसा माना जाता है की इस रथयात्रा में शामिल होने वाले श्रद्धालु को 100 यज्ञ करने के बराबर पुण्य मिलता है। इस रथयात्रा में भगवन जगन्नाथअपनी मौसी, रानी गुंडिचा के घर जातें हैं, जहाँ भगवान श्री जगन्नाथ 8 दिनों तक आराम करतें हैं, जिसके बाद आषाढ़ शुक्ल दसमी को पुनः वापसी की यात्रा होती है, जिसमें भक्त पुनः रथों को खींच कर श्री जगन्नाथ मंदिर ले जाते है, यह उत्सव कई दिनों तक चलता है जिसमें भाग लेने के लिए देश और विदेश से श्रद्धालु आते है। 


श्री जगन्नाथपुरी मंदिर की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें 

श्री जगन्नाथपुरी रथयात्रा की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें 

No comments:

Post a Comment