दक्षिणेश्वर काली मंदिर, कोलकाता की जानकारी Dakshineswar Kali Temple in Hindi - GYAN OR JANKARI

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Tuesday, July 6, 2021

दक्षिणेश्वर काली मंदिर, कोलकाता की जानकारी Dakshineswar Kali Temple in Hindi

श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर, कोलकाता की जानकारी 


श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर परिचय 

श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के कोलकाता नगर में गंगा नदी (हुगली नदी) के तट पर स्थित एक अत्यंत प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है, काली माता को समर्पित यह मंदिर कोलकाता में श्री कालीघाट शक्तिपीठ मंदिर के बाद दूसरा सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। श्री कालीघाट शक्तिपीठ मंदिर से श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर की दुरी लगभग 21 किलोमीटर है। श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर के मुख्य पुजारी प्रसिद्ध संत श्री रामकृष्ण परमहंस थे, यह मंदिर श्री रामकृष्ण परमहंस की कर्मभूमि, साधनास्थली और निवासस्थली रहा है, कहा जाता है इसी मंदिर में देवी ने श्री रामकृष्ण परमहंस को दर्शन दिए थे। इस मंदिर का निर्माण जान बाजार की जमींदार रानी रासमणि ने करवाया था जो स्वयं एक बहुत बड़ी देवी भक्त थी।  इस मंदिर का निर्माण कार्य 1847 में शुरू हुआ और 1855 में में पूर्ण हुआ था, इस प्रकार इस मंदिर में निर्माण में कुल आठ वर्ष का समय लगा था। 

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श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर

श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर का इतिहास

श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर का निर्माण रानी रासमणि ने करवाया था, रानी रासमणि का विवाह जमींदार बाबू रामचन्द्रदास से हुआ था, पति के निधन के बाद रानी रासमणि अपने पति की अकूत संपत्ति का प्रशासन सँभालने लगी। रानी रासमणि के पति जमींदार बाबू रामचन्द्रदास की देवी माँ में बहुत अधिक श्रद्धा थी तथा वे देवी माता का एक भव्य मंदिर बनवाना चाहते थे, परन्तु मंदिर बनवाने की अधूरी इच्छा के साथ ही उनकी मृत्यु हो गयी। रानी रासमणि स्वयं देवी माता की बहुत बड़ी भक्त थी, वे अक्सर गंगा के रास्ते (जलमार्ग द्वारा) कोलकाता से काशी जाकर देवी काली के मंदिर में दर्शन किया करती थी, एक बार वे इसी प्रकार देवी काली के दर्शन करने के लिए काशी जाने की तैयारियां कर रही थी, उसी रात देवी भगवती काली ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा की तुम्हे काशी जाने की कोई आवश्यकता नहीं है तुम यहीं रहकर गंगा के किनारे मेरे मंदिर का निर्माण करो। 


यह सपना देखकर रानी रासमणि की अचानक नींद खुल गयी और अगले दिन उन्होंने काशी जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया और गंगा नदी के किनारे मंदिर के लिए एक उचित जमींन की खोज शुरू कर दी। रानी रासमणि ने अपने सबसे छोटे दामाद को मंदिर के लिए जमींन खोजने का कार्य सौंपा, बहुत सी जगह देखने के बाद गंगा किनारे एक 54.4 बीघा के भूखंड का चयन किया गया, यह भूखंड कछुए के कूबड़ के आकर का था। 6 सितम्बर 1847 को मंदिर निर्माण के लिए 54.4 बीघा का यह भूखंड 42,500 रूपए में खरीद लिया गया और तुरंत ही इस पर निर्माण का कार्य शुरू हो गया। यह निर्माण कार्य आठ सालों तक चला और 31 मई 1955 को मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हो गया। 


श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर के निर्माण के बाद रानी रासमणि ने यह मंदिर अपने गुरु को समर्पित कर दिया तथा श्री रामकुमार चटोपाध्याय जो श्री रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई थे उन्हें इस मंदिर का मुख्य पुजारी नियुक्त किया गया। 31 मई 1855 को मंदिर में देवी काली की मूर्ति स्थापित की गयी और एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया, जिसमे एक लाख से अधिक ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया। इस अवसर पर ब्राह्मणों के अलावा कई संत, विद्वान, पंडित तथा बुद्धिजीवी भी काशी, उज्जैन, उड़ीसा, नवद्वीप जैसे दूर-दूर के स्थानों से पहुंचे। एक वर्ष के पश्चात श्री रामकुमार चटोपाध्याय का निधन हो गया, जिसके बाद उनके छोटे भाई श्री रामकृष्ण परमहंस को मंदिर का मुख्य पुजारी बनाया गया श्री रामकृष्ण परमहंस अगले 30 सालों तक श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर मंदिर के मुख्य पुजारी बने रहे, इस दौरान श्री रामकृष्ण परमहंस देवी काली माता के परम भक्त बन गए, ऐसा कहा जाता है की इसी मंदिर में देवी काली माता ने श्री रामकृष्ण परमहंस को साक्षात् दर्शन दिए थे। 


श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर के उद्घाटन के बाद रानी रासमणि केवल पांच साल और नौ महीने जीवित रहीं। 1861 में रानी रासमणि गंभीर रूप से बीमार हो गयी, जब उन्होंने महसूस किया की उनकी मृत्यु निकट है, तब उन्होंने मंदिर के रखरखाव के लिए दीनाजपूत (वर्तमान बांग्लादेश में स्थित) में खरीदी गयी अपनी संपत्ति को श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर ट्रस्ट को सौंपने का फैसला लिया, अपना यह कार्य पूर्ण करने केअगले ही दिन उनका निधन हो गया।  


रानी रासमणि का जीवन परिचय

रानी रासमणि का जन्म 28 सितम्बर 1793 को चासी-कैरबट्टा परिवार में हुआ था जो की एक शूद्र परिवार था, उनके पिता का नाम हरेकृष्ण दास माता का नाम रामप्रिया था। जब उनकी आयु सात वर्ष की थी तब उनकी माता का निधन हो गया, तथा केवल 11 वर्ष की आयु में उनका विवाह बाबू रामचन्द्रदास से हो गया, जो एक अत्यंत अमीर जमींदार परिवार से थे। रानी रासमणि के चार पुत्रियाँ थी। रानी रासमणि और उनके पति बाबू रामचन्द्रदास देवी माता में बहुत अधिक श्रद्धा रखते थे। बाबू रामचन्द्रदास देवी काली माता का एक भव्य मंदिर बनवाना चाहते थे परन्तु मंदिर बनवाने से पहले ही 1836 में उनका निधन हो गया। 


रानी रासमणि एक सशक्त महिला थी, तथा उस समय के पुरुष प्रधान समाज के बिच नारी शक्ति का अद्बुध उदाहरण थी। अपने पति की मृत्यु के बाद उन्होंने न केवल जमींदारी और वाणिज्य का प्रशासन संभाला बल्कि व्यापार का विस्तार भी किया। रानी रासमणि का अंग्रेजों से भी संघर्ष था, वे अंग्रेजों द्वारा लोगों पर किये जा रहे अत्याचारों का भरपूर विरोध किया करती थी। वे धार्मिक कार्यों और सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर योगदान दिया करती थी। उन्होंने सामाजिक और धार्मिक उत्थान के लिए अनगिनत कार्य किये, जिनमें से कुछ इस प्रकार है :-


  • अंग्रेजों ने गंगा नदी (हुगली नदी)के एक हिस्से में मछली पकड़ने पर कर लगा रखा था, जिससे मछुआरों की आजीविका बहुत अधिक प्रभावित होती थी। रानी रासमणि ने गंगा के जलमार्ग को लोहे की जंजीरों से अवरुद्ध कर दिया, जिससे गंगा नदी में अंग्रेजों के स्टीमर रुक गए और उनका जहाजरानी व्यापर बाधित हो गया। अंग्रेजों को मजबूरन मछुआरों पर लगे कर को हटाना पड़ा, जिसके बाद रानी रासमणि ने जलमार्ग को पुनः खोल दिया। 
  • अंग्रेजों ने धार्मिक जुलूसों पर प्रतिबन्ध लगाने का आदेश दिया, जिस पर रानी रासमणि ने इनका भरपूर विरोध किया जिसके फलस्वरूप अंग्रेजो को अपना आदेश वापस लेना पड़ा। 
  • इन्होने तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए सुवर्णरेखा नदी से जगन्नाथपुरी तक सड़क का निर्माण करवाया।
  • गंगा में स्नान करने वालों की सुविधा के लिए इन्होने अपने पति के नाम पर बाबूघाट का निर्माण करवाया, इसके अलावा उन्होंने अहिरीटोला घाट और निमटोला घाट का भी निर्माण करवाया। 
  • श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर का निर्माण भी इन्होने ही करवाया। 
  • इन्होने तात्कालीन इम्पीरियल लाइब्रेरी और हिन्दू कॉलेज के निर्माण के लिए दान दिया, जिन्हें वर्तमान में राष्ट्रीय पुस्तकालय और प्रेसीडेंसी विश्वविधालय कहा जाता है। 
  • इन्होने ढाका में मुस्लिम नवाब से 2000 हिन्दुओं की स्वतंत्रता खरीदी और उन्हें मुक्त करवाया। 
  • इन्होने हावड़ा में गंगा नदी पर पुल बनवाया। 
  • इनके अलावा भी इन्होने कई ऐसे उत्कृष्ट धार्मिक और सामाजिक कार्य किये जिनके कारण लोग इन्हें रानी कहकर सम्मान देने लगे, तथा इनकी दानवीरता, सामाजिक कार्यो और परोपकारी स्वभाव के कारण आज भी इन्हे बड़े सम्मान से याद किया जाता है। 


श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर का वास्तुशिल्प 

श्री दक्षिणेश्वर काली मंदिर कोलकाता शहर में पवित्र गंगा नदी (हुगली नदी) के किनारे स्थित है, मंदिर का परिसर 54.4 बीघा क्षेत्रफल में फैला है। मंदिर परिसर के दक्षिण में श्री काली माता का मुख्य मंदिर स्थित है, मंदिर एक विशाल चबूतरे पर स्थित है, जिस पर चढ़ने के लिए सीढियाँ बनी है, यह विशाल मंदिर तीन मंजिलो में बना हुआ है, मंदिर के ऊपर 9 विशाल गुम्बद बनाये गए है, जिन्हें दूर से भी आसानी से देखा जा सकता है। मंदिर के भीतरी भाग में काली माता की मूर्ति स्थापित है। काली माता की यह मूर्ति चांदी से बने हजार पंखुड़ियों वाले कमल के फूल पर स्थित है। इस मूर्ति में काली माता को शास्त्र धारण किये हुए तथा भगवान शिव के ऊपर खड़े हुए दर्शाया गया है।  

मंदिर परिसर में ही 12 शिव मंदिर एक कतार में बनाये गए है, इन सभी शिव मंदिरो की बनावट एक समान रखी गयी है। सभी शिव मंदिरों का मुख पूर्व की ओर है, सभी मंदिरों की भीतरी सजावट काले सफ़ेद पत्थरों से की गयी है, तथा सभी मंदिरों में काले पत्थर से निर्मित एक समान आकृति के शिवलिंग स्थापित किये गए है। 

मंदिर परिसर के उत्तर-पूर्व दिशा में विष्णु मंदिर स्थापित है, जिसे राधा-कांता मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के गर्भगृह में चांदी के सिंघासन पर भगवान श्री कृष्ण की साढ़े इक्कीस इंच की मूर्ति और राधा की 16 इंच की मूर्ति स्थापित है। 


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